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	<title>लाइफ-मंत्रा &#8211; UP Digital Diary</title>
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	<description>Hindi News &#38; Views</description>
	<lastBuildDate>Fri, 03 Jul 2026 04:50:55 +0000</lastBuildDate>
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	<title>लाइफ-मंत्रा &#8211; UP Digital Diary</title>
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		<title>बारिश में बंद कमरे और भीड़ बढ़ा सकते हैं इंफेक्शन का खतरा</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102164</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jul 2026 04:50:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[बारिश का मौसम भयंकर गर्मी से राहत तो दिलाता है पर इसके साथ यह सांस से जुड़े इन्फेक्शन के लिए भी खतरा पैदा करता है। वातावरण में बढ़ी हुई नमी, ऊपर-नीचे होता तापमान, पानी का भराव और लोगों का भीड़भाड़ में रहना बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के पनपने और फैलने का कारण बनता है। यही &#8230;]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">बारिश का मौसम भयंकर गर्मी से राहत तो दिलाता है पर इसके साथ यह सांस से जुड़े इन्फेक्शन के लिए भी खतरा पैदा करता है। वातावरण में बढ़ी हुई नमी, ऊपर-नीचे होता तापमान, पानी का भराव और लोगों का भीड़भाड़ में रहना बैक्टीरिया, वायरस और फंगस के पनपने और फैलने का कारण बनता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यही वजह है कि सामान्य सर्दी-जुकाम, इंफ्लुएंजा, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया लोगों में आम हो जाता है। फिर कुछ लोगों का शरीर इन बीमारियों के लिए बेहद संवेदनशील भी होता है। यहां पल्मोनोलॉजी डिपार्टमेंट, मैक्स सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, साकेत से डॉ. विवेक नांगिया बता रहे हैं किन लोगों को बारिश में रहता है सांस से जुड़े इन्फेक्शन का खतरा।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बारिश में किसे रहता है सांस से जुड़े इन्फेक्शन का ज्यादा खतरा?<br></strong>डॉ. विवेक नांगिया का कहना है बच्चे, बुजुर्ग, प्रेग्नेंट महिलाएं और फेफड़ों की समस्या जैसे COPD, अस्थमा या ब्रोंकाइटिस पहले से झेल रहे लोग बारिश के मौसम में इन्फेक्शन को लेकर ज्यादा संवेदनशील होते हैं। इसके अलावा, जो लोग डायबिटीज, दिल या किडनी से जुड़ी बीमारी, कैंसर या किसी तरह की इम्यूनोसप्रेसिव थेरेपी ले रहे हैं, उन्हें भी इन्फेक्शन का ज्यादा खतरा रहता है। स्मोकिंग और एयर पलूशन के संपर्क में आने से भी फेफड़े कमजोर हो जाते हैं और इससे भी लोग इन्फेक्शन को लेकर सेंसीटिव हो जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बचाव के लिए क्या करें?<br></strong>कुछ आसान तरीकों से सांस से जुड़े इन्फेक्शन का खतरा कम किया जा सकता है, जिनके बारे में डॉ. विवेक नांगिया यहां बता रहे हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph">लगातार हाथ धोना</p>



<p class="wp-block-paragraph">बीमार व्यक्ति से नजदीक से संपर्क में न आना</p>



<p class="wp-block-paragraph">भीड़ में जाते हुए मास्क पहनना</p>



<p class="wp-block-paragraph">घर के अंदर अच्छा वेंटिलेशन रखना</p>



<p class="wp-block-paragraph">पर्याप्त नींद लेना</p>



<p class="wp-block-paragraph">हेल्दी डाइट</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाइड्रेट रहना</p>



<p class="wp-block-paragraph">अस्थमा या COPD के मरीज रेगुलर इनहेलर लें और रेस्क्यू मेडिसिन तैयार रखें</p>



<p class="wp-block-paragraph">सीजनल और निमोनिया वैक्सीनेशन (जिन लोगों को खतरा ज्यादा है)</p>



<p class="wp-block-paragraph">मॉनसून में होने वाले ज्यादातर इन्फेक्शन वायरल होते हैं और ऐसे केस में एंटीबायोटिक काम नहीं करती। वहीं, बेवजह या बिना सोचे समझे एंटीबायोटिक ली जाएं तो ये एंटीमाइक्रोबियल बन जाती हैं, जिससे भविष्य में होने वाले इन्फेक्शन से शरीर को लड़ने में परेशानी होती है। एक्सपर्ट सलाह देते हैं कि दवा हमेशा डॉक्टर से बात करके ही लेनी चाहिए। उनका मानना है कि समय रहते बरती गई सावधानी किसी गंभीर बीमारी की रोकथाम और अस्पताल जाने से रोक सकती है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<item>
		<title>बार-बार आंख फड़कने को न करें इग्नोर: हो सकता है तनाव, थकान और नसों की कमजोरी का बड़ा संकेत</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102152</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 02 Jul 2026 05:53:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
		<category><![CDATA[लाइफ-मंत्रा]]></category>
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					<description><![CDATA[आंखों का फड़कना चिंता की बात नहीं होती और जिन लोगों को ऐसा बार-बार होता है वह बिनाइन एसेंशियल ब्लेफेरोस्पाज्म (BEB) की वजह से हो सकता है। वैसे कुछ रेयर केसेस में यह किसी बीमारी का भी संकेत हो सकता है। ऐसा क्यों होता है, इसके क्या लक्षण क्या हैं और कब यह परेशानी का &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आंखों का फड़कना चिंता की बात नहीं होती और जिन लोगों को ऐसा बार-बार होता है वह बिनाइन एसेंशियल ब्लेफेरोस्पाज्म (BEB) की वजह से हो सकता है। वैसे कुछ रेयर केसेस में यह किसी बीमारी का भी संकेत हो सकता है। ऐसा क्यों होता है, इसके क्या लक्षण क्या हैं और कब यह परेशानी का कारण बन सकता है, जानेंगे इस आर्टिकल में।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या होती है यह परेशानी<br></strong>अचानक एक या दोनों ही पलकें फड़कने लगती हैं। यह सामान्य प्रक्रिया है लेकिन गंभीर होने पर आंखों की रोशनी को भी प्रभावित कर सकती है। वैसे तो यह किसी के साथ भी हो सकता है, लेकिन मिडिल एज या बुजुर्ग महिलाओं को ज्यादा होता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या हैं कारण<br></strong>थकान, ज्यादा कैफीन या तनाव इसकी वजह हो सकता है। लगातार आंखों का फड़कना बिनाइन एसेंशियल ब्लेफेरोस्पाज्म की परेशानी होती है, जिसमें दोनों ही आंख एक ही समय पर फड़कती है। हालांकि, रिसर्च में ऐसा होने के सही कारणों का पता नहीं चल पाया है, लेकिन आंखों के आस-पास के मसल ग्रुप में समस्या होने पर ऐसा हो सकता है। कुछ लोगों में जेनेटिक्स की वजह भी आंखें ज्यादा फड़कती हैं। कई बार ब्रेन या नर्वस सिस्टम से जुड़ी ये परेशानियां भी आंखों के फड़कने का कारण बनती हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph">पार्किंसन्स डिजीज<br>ब्रेन डैमेज या स्ट्रोक<br>मेंटल हेल्थ की कोई खास दवा<br>मल्टीपल स्केलरोसिस<br>बेल पाल्सी<br>हेमिफेशियल स्पाज्म</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मैग्नीशियम की कमी भी बन सकता है कारण<br></strong>आंखों के मसल में होने वाली फड़कन मैग्नीशियम की कमी की वजह से भी हो सकता है। डाइट का सही ना होना या पोषक तत्वों के एब्जॉर्ब ना होने की स्थिति में भी ऐसा हो सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इन्हें होता है ज्यादा खतरा<br></strong>सिर पर कोई चोट लगी हो<br>यदि परिवार में किसी को यह समस्या हो<br>मेंटल हेल्थ की कोई दवाई ले रहे हों</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>ऐसे नजर आते हैं लक्षण<br></strong>आंखों में जलन<br>बार-बार आंखें झपकना<br>रोशनी से सेंसिटिविटी<br>ड्राई आइज<br>लगातार आंख फड़कने पर देखने में परेशानी</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अगर क्रॉनिक हो आंखों का फड़कना<br></strong>यदि आंखों के फड़कने की समस्या गंभीर हो तो पलकों और आंख के आस-पास के हिस्से को स्थायी रूप से नुकसान पहुंच सकता है। ऐसी परेशानियां हो सकती हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph">पलकें सामान्य से ज्यादा नीचे आ सकती हैं<br>आइब्रोज सामान्य से ज्यादा नीचे हो सकती हैं<br>आंख के ऊपरी या निचले हिस्से में एक्स्ट्रा स्किन इकट्ठी हो सकती है<br>पलकें असामान्य रूप से फोल्ड हो सकती हैं</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इस तरह कर सकते हैं बचाव<br></strong>कैफीन कम से कम लें<br>नींद पूरी करें<br>तनाव से बचें<br>डॉक्टर की सलाह पर आईड्रॉप का इस्तेमाल करें<br>धूप में सनग्लास लगाएं</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>घी खाने से बढ़ता है कोलेस्ट्रॉल और वजन? जाने…</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102111</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 01 Jul 2026 05:55:42 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[आयुर्वेद ग्रंथों में चिकित्सकीय उद्देश्य के लिए चार तरह के स्नेहक पदार्थों का उल्लेख है- घी, तेल और पशुओं की मांसपेशियों व अस्थिमज्जा से प्राप्त वसा। जड़ी बूटियों व खाद्य के प्रभावों को अवशोषित करने और अपनी मूल प्रकृति को बरकरार रखने के गुण के कारण घी सभी स्नेहकों में सर्वोत्तम माना जाता है।&#160; डॉ. &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आयुर्वेद ग्रंथों में चिकित्सकीय उद्देश्य के लिए चार तरह के स्नेहक पदार्थों का उल्लेख है- घी, तेल और पशुओं की मांसपेशियों व अस्थिमज्जा से प्राप्त वसा। जड़ी बूटियों व खाद्य के प्रभावों को अवशोषित करने और अपनी मूल प्रकृति को बरकरार रखने के गुण के कारण घी सभी स्नेहकों में सर्वोत्तम माना जाता है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉ. आर. वात्स्यायन (आयुर्वेदाचार्य, लुधियाना) बताते हैं कि संस्कृत में इसे घृतम् और सर्पि कहा गया है। सदियों से घी न केवल वैदिक अनुष्ठानों का हिस्सा रहा है, बल्कि इसे भारतीय रसोई में भी प्रमुख स्थान मिलता रहा है। गाय, भैंस के दूध के अलावा बकरी, ऊंट और घोड़ी के दूध से बने घी का प्रयोग आयुर्वेद चिकित्सा में किया जा सकता है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">गुणों से भरपूर होता है घी</h2>



<p class="wp-block-paragraph">सुश्रुत ने घी की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख करते हुए लिखा है कि यह स्वाद में मीठा, सौम्य, ठंडा और हल्का होता है। यह विकृत वात और पित्त को शांत करता है। आयुर्वेद विशेषज्ञों ने इसे स्वादिष्ट और स्मृति, बुद्धिमत्ता, चमक और सौम्यता के गुणों को बढ़ाने वाला बताया है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">आयुर्वेदिक ग्रंथों में गाय के घी को शरीर में सात प्रकार के ऊतकों पाचन तरल, रक्त, मांस, वसा, हड्डी, मज्जा और प्रजनन ऊतकों का संवर्धक बताया गया है। इसे स्फूर्तिदायक और कायाकल्प करने वाला तत्व तथा सभी चिकने पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">घी का स्वभाव लैक्सेटिव (पेट साफ करने वाला) होता है और यह कई बीमारियों में लाभदायक साबित होता है, जैसे&nbsp;<a href="https://www.jagran.com/lifestyle/health-purple-day-of-epilepsy-first-aid-steps-to-keep-person-safe-during-seizure-and-when-to-call-a-doctor-check-details-here-40184313.html" target="_blank" rel="noreferrer noopener">मिर्गी</a>, पागलपन, केमिकल से होने वाली जहरीली प्रतिक्रिया, सिरदर्द (माइग्रेन सहित) और शरीर के बाहरी छिद्रों से जुड़ी बीमारियां।</p>



<h2 class="wp-block-heading">असाध्य बीमारियों के लिए उपयोगी औषधि&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">घी का उपयोग बाह्य और आंतरिक दोनों ही औषधि के रूप में किया जा सकता है। शास्त्रीय आयुर्वेद ग्रंथों में &#8216;घृत चिकित्सा&#8217; का उल्लेख है, जिसमें विभिन्न प्रकार के घी से उपचार किया जाता है। इसके लिए, चुनिंदा जड़ी-बूटियों के उबाले हुए काढ़े को शुद्ध घी में पकाया जाता है, ताकि वह दूसरी दवाओं के असरदार तत्वों को सोख सके।</p>



<p class="wp-block-paragraph">घी को कितने समय तक रखा गया है, उसके आधार पर उसके गुणों में अंतर बताने वाले संदर्भ भी मिलते हैं। एक वर्ष पुराने घृत को बाहरी उपयोग के लिए सबसे अच्छा माना जाता है। कुंभ घृत और महाघृत जो क्रमश- 11 से 100 वर्ष तक पुराने होते हैं, कुछ असाध्य बीमारियों में बेहद उपयोगी औषधि के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">घी का प्रयोग आयुर्वेदिक चिकित्सा &#8216;पंचकर्म&#8217; के पहले चरण (तेल लगाना) में किया जाता है। कमजोर रोगियों में इसकी मालिश अत्यधिक प्रभावी मानी जाती है, क्योंकि यह ऊतकों के स्तर पर शरीर को पोषण देता है और रक्तसंचार को सुधारता है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">माइग्रेन, पुरानी साइनसाइटिस या एलर्जिक श्वसन समस्याओं में 10-15 दिनों तक नियमित रूप से नथुनों में कुछ बूंद हल्का गुनगुना घी डालने से लाभ मिलता है। &#8216;अक्षितर्पण&#8217; एक और पंचकर्म उपचार है, जहां नेत्र रोगों के उपचार के लिए आंखों को ताजे और पिघले हुए घी में कुछ मिनटों के लिए डुबोया जाता है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">घी को लेकर, भ्रम और मतभिन्नता भी&nbsp;&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">मानव शरीर पर घी के प्रभाव को लेकर आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा दृष्टिकोण में काफी भिन्नता है। पंचकर्म प्रक्रिया के दौरान घी के सेवन के बाद रोगियों की ट्राइग्लिसराइड स्तर में गिरावट की रिपोर्ट होती है, फिर भी आम जनता के मन में घी के सुरक्षित सेवन के बारे में बहुत भ्रम और भय व्याप्त है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">हालांकि आयुर्वेद घी या किसी भी दूसरी चीज को सीमित मात्रा में लेने पर जोर देता है, लेकिन शरीर के अलग-अलग सिस्टम पर घी के अच्छे और बुरे असर को पक्के तौर पर जानने के लिए दोनों सिस्टम के जानकारों की एक संयुक्त स्टडी की जरूरत है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">घी पर आधारित कुछ शास्त्रीय आयुर्वेदिक औषधियां</h2>



<p class="wp-block-paragraph">अर्जुन घृत- हृदय रोग<br>पंचतिक्त घृत- सोरायसिस<br>ब्रह्मी घृत एवं कल्याण घृत &#8211; मानसिक विकार<br>त्रिफला घृत- नेत्र रोग<br>शतावरी घृत- महिला रोग<br>इंदुकांत घृत- जठरांत्र संबंधी समस्याएं<br>फल घृत- बांझपन और गर्भावस्था से संबंधित समस्याएं<br>अश्वगंधा घृत- तंत्रिका तंत्र को मजबूत करने के लिए</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>बारिश की बूंदों के गिरते ही हवा में क्यों फैल जाती है सोंधी-सी खुशबू?</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102084</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 30 Jun 2026 06:30:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[तपती गर्मी के बाद जब बारिश की पहली बूंदें सूखी धरती पर गिरती हैं, तो मिट्टी से आने वाली वह सोंधी खुशबू सीधा दिल को सुकून पहुंचाती है। हम सभी को यह महक बहुत पसंद होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह खुशबू आखिर आती कहां से है? आपको जानकर हैरानी होगी &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">तपती गर्मी के बाद जब बारिश की पहली बूंदें सूखी धरती पर गिरती हैं, तो मिट्टी से आने वाली वह सोंधी खुशबू सीधा दिल को सुकून पहुंचाती है। हम सभी को यह महक बहुत पसंद होती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि यह खुशबू आखिर आती कहां से है? आपको जानकर हैरानी होगी कि यह सिर्फ एक सुखद अहसास नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बेहद रोचक वैज्ञानिक कारण छिपा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><em><strong>आकाश हेल्थकेयर में माइक्रोबायोलॉजी की कंसल्टेंट और हॉस्पिटल इंफेक्शन कंट्रोल ऑफिसर, डॉ. दिशा भाटिया</strong>&nbsp;</em>ने इस दिलचस्प प्रक्रिया के बारे में डिटेल में बताया है। आइए जानते हैं क्या है यह विज्ञान और क्यों हमें इस मौसम में थोड़ी सावधानी बरतने की भी जरूरत है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या है सोंधी महक का राज?<br></strong>डॉ. भाटिया के अनुसार, जब मिट्टी लंबे समय तक सूखी रहती है, तो उसमें दो अहम चीजें काम कर रही होती हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph">पौधों का नेचुरल ऑयल: सूखे के मौसम में पौधों से निकलने वाले कुछ नेचुरल ऑयल मिट्टी में जमा हो जाते हैं।<br>सूक्ष्म जीव: मिट्टी के अंदर &#8216;एक्टिनोमाइसीट्स&#8217; नाम के विशेष सूक्ष्म जीव रहते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ये नेचुरल ऑयल और सूक्ष्म जीव आपस में मिलकर एक खास कंपाउंड तैयार करते हैं, जिसे वैज्ञानिक भाषा में &#8216;जिओस्मिन&#8217; कहा जाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब बारिश की बूंदें जमीन पर गिरती हैं, तो यह &#8216;जिओस्मिन&#8217; हवा में बहुत ही सूक्ष्म कणों के रूप में चारों तरफ फैल जाता है। हवा में तैरते हुए जब ये कण हमारी सांसों तक पहुंचते हैं, तो हमें वही चिर-परिचित सोंधी महक महसूस होती है। विज्ञान में इस पूरी प्रक्रिया और बारिश की इस खास खुशबू को &#8216;पेट्रिकोर&#8217; का नाम दिया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>सुकून के साथ जरूरी है थोड़ी सावधानी<br></strong>यूं तो बारिश की यह खुशबू मन को बहुत शांति देती है, लेकिन डॉ. भाटिया चेतावनी देती हैं कि बारिश के शुरुआती दिनों में हवा में कुछ ऐसे तत्व भी बढ़ जाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। इनमें शामिल हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph">फफूंद<br>परागकण<br>अन्य एलर्जेन</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>किन लोगों को है ज्यादा खतरा?<br></strong>हवा में इन एलर्जेन के बढ़ने से उन लोगों को विशेष रूप से सावधानी बरतनी चाहिए जो पहले से ही कुछ स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे हैं, जैसे:</p>



<p class="wp-block-paragraph">अस्थमा के मरीज<br>सांस संबंधी बीमारियों वाले लोग<br>किसी भी तरह की एलर्जी से पीड़ित व्यक्ति</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर की सलाह<br></strong>बारिश का मौसम प्रकृति का एक खूबसूरत तोहफा है, इसलिए इसका पूरा लुत्फ उठाएं, लेकिन अपने शरीर के संकेतों को भी पहचानें। डॉ. भाटिया सलाह देती हैं कि अगर बारिश के मौसम में आपको सांस लेने में कोई तकलीफ महसूस हो, लगातार छींकें आएं या एलर्जी के लक्षण बढ़ते हुए दिखें, तो इसे बिल्कुल भी नजरअंदाज न करें और तुरंत किसी डॉक्टर से सलाह लें।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>बच्चे के लिए क्यों अमृत समान माना जाता है मां का दूध? </title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102056</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Jun 2026 05:14:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[मां का दूध बच्चों के लिए अमृत समान होता है, ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि यह सिर्फ पोषण ही नहीं देता, बल्कि बच्चे के डीएनए की संरचना में भी कुछ बहुत खास बदलाव करता है? हाल ही में खून के नमूनों पर हुए एक शोध में यह दिलचस्प &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">मां का दूध बच्चों के लिए अमृत समान होता है, ये तो हम सभी जानते हैं, लेकिन क्या आपको पता है कि यह सिर्फ पोषण ही नहीं देता, बल्कि बच्चे के डीएनए की संरचना में भी कुछ बहुत खास बदलाव करता है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">हाल ही में खून के नमूनों पर हुए एक शोध में यह दिलचस्प और चौंकाने वाली बात सामने आई है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि इस नई रिसर्च में बच्चों की सेहत और उनके डीएनए को लेकर क्या-क्या खुलासे हुए हैं।</p>



<h3 class="wp-block-heading">रिसर्च में क्या सामने आया?</h3>



<p class="wp-block-paragraph">स्पेन के &#8216;बार्सिलोना इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल हेल्थ&#8217; और ब्रिटेन की &#8216;एक्सेटर और ब्रिस्टल यूनिवर्सिटी&#8217; के वैज्ञानिकों ने मिलकर यह महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। इस रिसर्च टीम ने कुल 3,421 बच्चों के खून के नमूनों की जांच की।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इस दौरान दो तरह के बच्चों के बीच तुलना की गई:</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पहले वो, जिन्हें जन्म के बाद शुरुआती कम से कम तीन महीनों तक सिर्फ मां का दूध पिलाया गया था।<br>दूसरे वो, जिन्हें मां का दूध नहीं मिला था।<br>जांच में यह बात सामने आई कि जिन बच्चों ने तीन महीने तक सिर्फ मां का दूध पिया था, उनके डीएनए में &#8216;एपिजेनेटिक मार्कर&#8217; (यानी डीएनए में होने वाले केमिकल बदलाव) पाए गए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इम्यूनिटी और विकास से जुड़े जींस पर दिखा सीधा असर<br></strong>शोधकर्ताओं ने पाया कि मां का दूध पीने वाले बच्चों में &#8216;डीएनए मिथाइलेशन&#8217; नाम की एपिजेनेटिक प्रक्रिया के निशान काफी ज्यादा थे। सबसे खास बात यह है कि ये निशान शरीर के उन जींस पर अधिक पाए गए, जो सीधे तौर पर बच्चे की इम्युनिटी और उसके विकास से जुड़े होते हैं। यह बदलाव उन बच्चों की तुलना में औसतन कहीं अधिक था, जिन्हें मां का दूध नसीब नहीं हुआ था।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या है एपिजेनेटिक्स और &#8216;ऑफ स्विच&#8217; का विज्ञान?<br></strong>विज्ञान के इन भारी-भरकम शब्दों को आसान भाषा में ऐसे समझें:</p>



<p class="wp-block-paragraph">एपिजेनेटिक्स: यह हमारे जींस और हमारे आस-पास के पर्यावरण के बीच का तालमेल है। इसी आपसी असर से यह तय होता है कि कोई जीन कैसा व्यवहार करेगा।<br>डीएनए मिथाइलेशन: यह प्रक्रिया शरीर में एक &#8216;ऑफ स्विच&#8217; की तरह काम करती है। इसका काम किसी भी जीन को खुद को अभिव्यक्त करने से रोकना होता है। यह प्रक्रिया भ्रूण के विकास, जीनोमिक स्थिरता और शरीर के अन्य जरूरी कामों के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अभी भी असमंजस में हैं वैज्ञानिक<br></strong>यह पूरी स्टडी &#8216;क्लीनिकल एपिजेनेटिक्स&#8217; नाम के मशहूर जर्नल में प्रकाशित हुई है। हालांकि, इस शोध में एक बात स्पष्ट की गई है- रिसर्च में डीएनए पर पड़े इन निशानों को तो देखा गया, लेकिन यह नहीं परखा गया कि इन एपिजेनेटिक बदलावों का असल में बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता या उनके शारीरिक विकास पर क्या प्रभाव पड़ा।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
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		<title>अनजाने में की गई ये गलतियां बिगाड़ देती हैं महिलाओं का हार्मोनल बैलेंस</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102020</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 28 Jun 2026 05:41:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[महिलाओं को उम्र के कई पड़ावों पर हार्मोनल बदलाव से गुजरना होता है, जो उनकी पूरी सेहत, एनर्जी और मूड को प्रभावित करता है। हालांकि, कई बार महिलाएं अनजाने में कुछ ऐसी आदतें अपना लेती हैं, जो चुपके-चुपके उनके हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ता है। इन छोटी-छोटी आदतों का शरीर पर काफी गहरा असर पड़ता है। &#8230;]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">महिलाओं को उम्र के कई पड़ावों पर हार्मोनल बदलाव से गुजरना होता है, जो उनकी पूरी सेहत, एनर्जी और मूड को प्रभावित करता है। हालांकि, कई बार महिलाएं अनजाने में कुछ ऐसी आदतें अपना लेती हैं, जो चुपके-चुपके उनके हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन छोटी-छोटी आदतों का शरीर पर काफी गहरा असर पड़ता है। हालांकि, अच्छी खबर यह है कि इन आदतों में सुधार करके हार्मोनल बैलेंस में सुधार किया जा सकता है। आइए जानें क्या हैं ये आदतें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>हार्मोनल बैलेंस प्रभावित करती हैं ये आदतें<br></strong>बिगड़ा हुआ स्लीप पैटर्न- आजकल देर रात तक मोबाइल चलाना आम हो गया है, लेकिन यह आदत स्ट्रेस हार्मोन कोर्टिसोल को बढ़ाकर एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे प्रमुख हार्मोन्स को असंतुलित कर देती है। हर दिन 7-8 घंटे की गहरी नींद हार्मोन्स को सही रखने के लिए जरूरी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">बहुत ज्यादा स्ट्रेस लेकर चलना- महिलाएं अक्सर परिवार, काम और जिम्मेदारियों में खुद को भूल जाती हैं। लगातार स्ट्रेस हार्मोनल फंक्शन को सबसे पहले प्रभावित करता है और थायरॉइड, पीसीओडी, अनियमित पीरियड्स जैसी समस्याओं को बढ़ावा देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्यादा चीनी और प्रोसेस्ड फूड खाना- पैकेट फूड, मीठे ड्रिंक्स, बेकरी आइटम और फ्राई स्नैक्स इंसुलिन बढ़ाते हैं, जिससे शरीर में सूजन और हार्मोनल डिस्टर्बेंस होता है। हाई शुगर डाइट पीसीओएस और वजन बढ़ने का बड़ा कारण बनती है। इनकी जगह घर का खाना, फ्रूट्स, सलाद और हेल्दी फैट्स को प्राथमिकता दें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">खाने में पोषक तत्वों की कमी- कई महिलाएं कैल्शियम, आयरन, विटामिन-डी, बी12, ओमेगा-3 और मैग्नीशियम की कमी का शिकार होती हैं। ये सभी हार्मोन्स को बैलेंस रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसलिए रोजाना दाल, हरी सब्जियां, दही, फल, नट्स, बीज और सही मात्रा में प्रोटीन लेना जरूरी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पानी कम पीना- डिहाइड्रेशन शरीर की मेटाबॉलिक और हार्मोनल एक्टिवीज को सीधे प्रभावित करता है। कम पानी पीने से शरीर में टॉक्सिन्स जमा होते हैं और स्किन, पीरियड्स, मूड स्विंग्स से जुड़ी समस्याएं बढ़ जाती हैं। इसलिए दिनभर में कम से कम 7-8 गिलास पानी जरूर पिएं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">फिजिकल एक्टिविटी की कमी- लंबे समय तक बैठकर काम करने से हार्मोन इंसुलिन, थायरॉइड और मेटाबालिज्म कमजोर हो जाते हैं। रोज 30 मिनट तेज चलना, योग या हल्का वर्कआउट हार्मोनल बैलेंस को बहुत अच्छी तरह सुधारता है।<br>अनियमित खाने की आदतें- खाना छोड़ना, देर से खाना, या बार-बार जंक फूड खाना शुगर लेवल और हार्मोनल बैलेंस को बिगाड़ देता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सेहत पर ध्यान न देना- अक्सर महिलाएं अपनी हेल्थ को प्राथमिकता नहीं देतीं। शरीर की जरूरतों को नजरअंदाज करना, समय पर जांच न करवाना या लक्षणों को हल्के में लेना हार्मोनल समस्याओं को बढ़ाता है।</p>
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		<title>कहीं आपका आयरन इनटेक दिमाग को वक्त से पहले बूढ़ा तो नहीं कर रहा? </title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/101990</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 27 Jun 2026 04:40:17 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिमाग के न्यूरान में ज्यादा आयरन दिमाग के सेल्स की रक्षा को कम कर सकता है, जिससे तनाव व अन्य सेलुलर नुकसान के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। इसे उन्होंने &#8216;क्रोनोफेरोप्टोसिस&#8217; नाम दिया है।&#160; एक्स्ट्रा आयरन सेल्स की रक्षा करने वाले एंटीआक्सीडेंट प्रोटीन को खत्म कर देता है, जिससे दिमाग &#8230;]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">शोधकर्ताओं ने पाया है कि दिमाग के न्यूरान में ज्यादा आयरन दिमाग के सेल्स की रक्षा को कम कर सकता है, जिससे तनाव व अन्य सेलुलर नुकसान के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाती है। इसे उन्होंने &#8216;क्रोनोफेरोप्टोसिस&#8217; नाम दिया है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">एक्स्ट्रा आयरन सेल्स की रक्षा करने वाले एंटीआक्सीडेंट प्रोटीन को खत्म कर देता है, जिससे दिमाग के सेल्स बाहरी तनावों के प्रति संवेदनशील व कमजोर हो जाती हैं। सेल डेथ डिस्कवरी नामक पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों से पता चलता है कि दिमाग की सेल्स में आयरन का संचय न्यूरोडीजेनेरेशन रोगों की भविष्यवाणी, रोकथाम और उपचार के प्रयासों में महत्वपूर्ण लक्ष्य हो सकता है। शोधकर्ताओं ने यह जानकारी दी।</p>



<h2 class="wp-block-heading">न्यूरान तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">अमेरिका के साल्क इंस्टीट्यूट फार बायोलाजिकल स्टडीज में शोध प्रोफेसर पाम माहेर ने कहा, &#8220;अल्जाइमर रोग और अन्य न्यूरोडीजेनेरेशन विकारों के संदर्भ में लचीलापन एक महत्वपूर्ण चर्चा का विषय बन गया है, जिसका उद्देश्य दिमाग को उन तनावों का सामना करने में अधिक लचीला बनाना है, जो न्यूरोडीजेनेरेशन में योगदान करते हैं।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">महेर ने कहा कि अध्ययन दर्शाता है कि जब आयरन एक निश्चित स्तर पर पहुंचता है, तो सेल्स लचीलापन खो देती हैं, जिससे न्यूरान्स तनाव के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाते हैं जो उन्हें नुकसान पहुंचाते हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">आयरन का संचय न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से संबंधित&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">शोधकर्ताओं ने कहा कि पिछले अध्ययनों में पाया गया है कि आयरन धीरे-धीरे न्यूरान्स के अंदर जमा हो सकता है। जबकि जीवन के प्रारंभिक चरण में आयरन का संचय न्यूरॉन के काम पर कम प्रभाव डालता है, लेकिन जीवन के बाद के चरण में यह धीरे-धीरे न्यूरोनल की मृत्यु में योगदान कर सकता है। टीम ने यह पता लगाने के लिए न्यूरॉन्स का अध्ययन किया कि क्या और कैसे यह आयरन का संचय न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से संबंधित है।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">लंबे समय तक आयरन की अधिकता फेरोप्टोटिक स्ट्रेस की स्थिति पैदा करती है, जिसमें नर्व सेल्स जीवित तो रहती हैं, लेकिन ऑक्सीडेटिव चोट के प्रति संवेदनशील हो जाती हैं। आयरन हरे पत्तेदार साग, स्टार्च वाले अनाज, लीन मीट, समुद्री भोजन और दूसरी खाने की चीजों में पाया जाता है ।</p>



<h2 class="wp-block-heading">न्यूरान्स पर तनाव डालने लगता है आयरन का जमाव</h2>



<p class="wp-block-paragraph">हालांकि, लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले न्यूरॉन्स में कुछ प्रक्रियाओं का बढ़ना और कुछ का कम होना देखा गया। इसमें हानिकारक केमिकल का जमा होना, फायदेमंद केमिकल का कम होना और लिपिड पेरोक्सीडेशन का बढ़ना शामिल था।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">जब हर ग्रुप को और ज्यादा तनाव का सामना करना पड़ा, तो कम समय तक संपर्क में रहने वाले न्यूरान्स तनाव झेल पाए, जबकि लंबे समय तक संपर्क में रहने वाले न्यूरान्स ऐसा नहीं कर पाए। माहेर की लैब में लेखक नवाब जान डार ने कहा, इन सेल्स का भविष्य आयरन की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि इस बात से तय होता है। कि वे कितने समय तक तनाव में रहती हैं।&#8221;&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">शोधकार्ताओं ने कहा कि ऐसे उपाय विकसित किए जा सकते हैं जिनसे उस स्थिति में मदद मिल सके, जब दिमाग कमजोर होने लगता है यानी जब आयरन का जमाव न्यूरॉन्स पर तनाव डालने लगता है। इससे आयरन के असंतुलन को ठीक किया जा सकेगा और न्यूरॉन्स को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखा जा सकेगा।</p>
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		<item>
		<title> इन वजहों से रातभर बदलते हैं आप करवटें…</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/101956</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 26 Jun 2026 05:22:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[लॉजिक कहता है कि दिनभर की थकान के बाद शरीर को रात में गहरी नींद आनी चाहिए, जबकि कुछ लोगों के मामले में यह लॉजिक फेल हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो रातभर करवटें बदलते रहते हैं पर नींद आती ही नहीं। पर कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? चलिए नींद न &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">लॉजिक कहता है कि दिनभर की थकान के बाद शरीर को रात में गहरी नींद आनी चाहिए, जबकि कुछ लोगों के मामले में यह लॉजिक फेल हो जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो रातभर करवटें बदलते रहते हैं पर नींद आती ही नहीं। पर कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? चलिए नींद न आने के कारणों के बारे में डिटेल में बात करते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>थकान के बावजूद नींद न आने के कारण<br></strong>रात में नींद न आने के बहुत से कारण होते हैं, आइए इनके बारे में जानते हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इंसोम्निया<br></strong>जब शरीर पूरी तरह से थकने के बाद भी रात में सो नहीं पाता तो इसे अक्सर इंसोम्निया कहा जाता है। इंसोम्निया एक तरह का स्लीप डिसऑर्डर है, जिसमें व्यक्ति को सोने में परेशानी होने के साथ ही गंभीर मामलों में रातभर नींद तक नहीं आती।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>तनाव और एंग्जाइटी<br></strong>सोते समय दिमाग में विचार आते रहना, किसी बात को लेकर लंबे समय से चिंता और एंग्जाइटी जैसी समस्याएं स्लीप साइकल बिगाड़ देती हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>थायरॉइड<br></strong>अगर आपका थायरॉइड लेवल बैलेंस नहीं है तो यह नींद न आने का सबसे बड़ा कारण हो सकता है। यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि अकेले नींद न आने की दिक्कत को थायरॉइड डिसऑर्डर से नहीं जोड़ा जा सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>मेनोपॉज</strong><br>महिलाओं को नींद न आने की एक वजह मेनोपॉज भी है, क्योंकि इस दौरान शरीर में कई तरह के हॉर्मोनल बदलाव होते हैं। इसके साथ अगर हॉट फ्लैश और पसीना बहुत आ रहा है तो इस संकेत को अनदेखा न करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>दवाइयां<br></strong>ब्लड प्रेशर, डिप्रेशन और एंग्जाइटी से बचने के लिए ली जा रही दवाइयां भी स्लीप साइकल बिगाड़ती हैं। इस बारे में डॉक्टर से सलाह ली जा सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>बेहतर नींद के लिए टिप्स<br></strong>सोते समय कमरे में पर्याप्त अंधेरा होने के साथ हल्की ठंडक भी होनी चाहिए। वहीं, नींद के लिए शांति कितनी जरूरी है यह तो आप जानते ही हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">सोने का एक समय तय करें ताकि बॉडी क्लॉक उसी तरह से खुद को ढाल पाए।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कैफीन, शराब, निकोटीन के सेवन और सोने के समय के बीच कम से कम 4-6 घंटे का गैप रखें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">ज्यादा स्क्रीन टाइम भी स्लीप साइकल खराब करता है, सोने से 1 घंटे पहले ही मोबाइल और लैपटॉप अलग रख दें।</p>
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		<item>
		<title>डेस्क जॉब वाले ध्यान दें! टहलने के लिए हर घंटे निकालें 5 मिनट</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/101929</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 25 Jun 2026 05:06:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[आजकल के वर्किंग कल्चर में ऑफिस में घंटों एक ही कुर्सी पर बैठे रहना लोगों की मजबूरी बन गया है। लगातार बैठे रहने की इस आदत से कमर दर्द के साथ-साथ स्वास्थ्य से जुड़ी कई अन्य परेशानियां भी शरीर को घेरने लगती हैं। हालांकि, एक हालिया शोध ने इस बड़ी परेशानी का बहुत ही आसान &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आजकल के वर्किंग कल्चर में ऑफिस में घंटों एक ही कुर्सी पर बैठे रहना लोगों की मजबूरी बन गया है। लगातार बैठे रहने की इस आदत से कमर दर्द के साथ-साथ स्वास्थ्य से जुड़ी कई अन्य परेशानियां भी शरीर को घेरने लगती हैं। हालांकि, एक हालिया शोध ने इस बड़ी परेशानी का बहुत ही आसान और कारगर समाधान बताया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>हर 1 घंटे में निकालें 5 मिनट<br></strong>&#8216;ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन&#8217; में प्रकाशित एक नई रिसर्च के मुताबिक, अगर आप लंबे समय तक बैठे रहने से होने वाले स्वास्थ्य नुकसानों से बचना चाहते हैं, तो हर एक घंटे में मात्र पांच मिनट के लिए जरूर टहलें। शोध में बताया गया है कि यह 5 मिनट का पैदल चलना, व्यावहारिकता और प्रभावशीलता के बीच सबसे बेहतरीन संतुलन बनाता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>काम पर असर नहीं, बल्कि मूड होगा शानदार<br></strong>अक्सर लोगों को लगता है कि काम के बीच में ब्रेक लेने से उनकी परफॉर्मेंस खराब होगी, लेकिन इस अध्ययन के नतीजे इससे बिल्कुल अलग हैं। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि:</p>



<p class="wp-block-paragraph">इन छोटे-छोटे ब्रेक्स से काम के परफॉर्मेंस पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।<br>इससे मूड में काफी सुधार आता है।<br>काम के दौरान होने वाली थकान भी कम होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><br><strong>गंभीर बीमारियों का खतरा होगा कम<br></strong>लंबे समय तक एक ही जगह पर बिना चले-फिरे बैठे रहना आज के समय में एक बहुत बड़ी स्वास्थ्य चिंता के रूप में सामने आया है। लगातार ऐसे ही बैठे रहने से शरीर में कई गंभीर बीमारियों के विकसित होने की आशंका बढ़ जाती है, जिनमें मुख्य हैं:</p>



<p class="wp-block-paragraph">मोटापा<br>डायबिटीज<br>दिल की बीमारियां</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>विशेषज्ञ क्या कहते हैं?<br></strong>अमेरिका के &#8216;कोलंबिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर&#8217; के शोधकर्ताओं का कहना है कि लंबे समय तक गतिहीन रहने के नुकसानों को कम करने के लिए सार्वजनिक स्वास्थ्य में चलने-फिरने के इन छोटे-छोटे ब्रेक्स का प्रस्ताव दिया गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अध्ययन में यह भी सुझाव दिया गया है कि टहलने के इन उपायों को सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीति और शारीरिक गतिविधि के दिशा-निर्देशों में शामिल किया जा सकता है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने इस बात की ओर भी इशारा किया है कि भले ही ये छोटे ब्रेक प्रस्तावित किए गए हों, लेकिन वास्तविक दुनिया में लोग अभी भी इस पर अमल करते हुए नहीं देखे जाते हैं।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>हड्डियों को मजबूत करने वाला विटामिन-D बन सकता है किडनी और दिल का दुश्मन</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/101919</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 24 Jun 2026 06:02:02 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लाइफ-मंत्रा]]></category>
		<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://updigitaldiary.in/?p=101919</guid>

					<description><![CDATA[आजकल जरा-सी थकान या कमजोरी महसूस होते ही लोग तुरंत विटामिन-D के सप्लीमेंट्स लेना शुरू कर देते हैं। धूप में कम निकलना और बिगड़े हुए लाइफस्टाइल के कारण इन गोलियों का चलन काफी बढ़ गया है। यह बिल्कुल सच है कि हड्डियों की मजबूती, अच्छी इम्युनिटी और बेहतर सेहत के लिए विटामिन-D बहुत जरूरी है, &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आजकल जरा-सी थकान या कमजोरी महसूस होते ही लोग तुरंत विटामिन-D के सप्लीमेंट्स लेना शुरू कर देते हैं। धूप में कम निकलना और बिगड़े हुए लाइफस्टाइल के कारण इन गोलियों का चलन काफी बढ़ गया है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यह बिल्कुल सच है कि हड्डियों की मजबूती, अच्छी इम्युनिटी और बेहतर सेहत के लिए विटामिन-D बहुत जरूरी है, लेकिन क्या आपको पता है कि इसकी अधिकता आपकी सेहत के लिए बहुत बड़ा खतरा बन सकती है?</p>



<p class="wp-block-paragraph">जी हां, जिस तरह विटामिन-D की कमी शरीर को नुकसान पहुंचाती है, उसी तरह बिना डॉक्टरी सलाह के इसके सप्लीमेंट्स का जरूरत से ज्यादा सेवन भी आपकी सेहत बिगाड़ सकता है। आइए, फोर्टिस अस्पताल, शालीमार बाग के कंसल्टेंट-नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. भानु मिश्रा से समझते हैं इस गंभीर खतरे के बारे में।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>Vitamin-D की ओवरडोज आखिर खतरनाक क्यों है?<br></strong>जब हम अपनी मर्जी से सप्लीमेंट्स खाते हैं, तो शरीर में विटामिन-D का स्तर सामान्य से बहुत ज्यादा बढ़ जाता है। मेडिकल भाषा में इसे ‘विटामिन-डी टॉक्सिसिटी’ या ‘हाइपरविटामिनोसिस डी’ कहा जाता है। एक बात हमेशा ध्यान रखें कि यह समस्या कभी भी धूप सेंकने या डाइट से नहीं होती, बल्कि केवल सप्लीमेंट्स की ओवरडोज से होती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">विटामिन-D का मुख्य काम हमारे शरीर में कैल्शियम को सोखना है, लेकिन जब विटामिन-D हद से ज्यादा हो जाता है, तो शरीर में कैल्शियम का स्तर भी असामान्य रूप से बढ़ जाता है। इस स्थिति को ‘हाइपरकैल्सीमिया’ कहते हैं और यही स्थिति कई गंभीर बीमारियों की जड़ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इन लक्षणों को कभी न करें नजरअंदाज<br></strong>विटामिन-D की ओवरडोज के लक्षण रातों-रात नहीं बल्कि धीरे-धीरे सामने आते हैं, इसलिए इन्हें पहचानना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। अगर आप सप्लीमेंट्स ले रहे हैं और आपको नीचे दी गई कोई भी समस्या महसूस हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर से मिलें:</p>



<p class="wp-block-paragraph">थकान और मांसपेशियों में कमजोरी: कैल्शियम की अधिकता के कारण आपकी मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं और आप हमेशा थका हुआ महसूस करते हैं।<br>पेट की दिक्कतें और कब्ज: शरीर में बढ़ा हुआ कैल्शियम पाचन तंत्र को बिगाड़ देता है। इससे जी मचलाना, उल्टी आना, पेट दर्द और कब्ज की शिकायत हो सकती है।<br>बार-बार पेशाब आना और बहुत ज्यादा प्यास: बढ़े हुए कैल्शियम को किडनी शरीर से बाहर निकालने की कोशिश करती है। इससे आपको बार-बार पेशाब आता है और शरीर में पानी की कमी हो सकती है।<br>भूख और वजन में कमी: पाचन की समस्याओं और लगातार बीमार महसूस करने की वजह से भूख लगनी बंद हो सकती है, जिससे तेजी से वजन गिरने लगता है।<br>हड्डियों में दर्द: ज्यादा विटामिन-D हड्डियों को मजबूत करने के बजाय उनमें मौजूद कैल्शियम को ही बाहर निकालने लगता है, जिससे हड्डियां कमजोर हो जाती हैं और दर्द रहने लगता है।<br>किडनी पर सीधा असर: कैल्शियम का स्तर लंबे समय तक ज्यादा रहे तो किडनी में पथरी बन सकती है। गंभीर मामलों में यह किडनी फेलियर का कारण भी बन सकता है।<br>दिल से जुड़ी बीमारियां: अगर स्थिति ज्यादा गंभीर हो जाए, तो यह आपके दिल की धड़कन को भी प्रभावित कर सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>विटामिन-डी के ओवरडोज से कैसे बचें?<br></strong>विटामिन-D की ओवरडोज से बचना बहुत आसान है, बस आपको इन जरूरी बातों का ध्यान रखना है:</p>



<p class="wp-block-paragraph">डोज का सख्ती से पालन करें: डॉक्टर ने सप्लीमेंट्स की जो मात्रा और जितने दिनों का कोर्स तय किया है, केवल उतना ही लें। अपनी मर्जी से डोज बढ़ाने की गलती न करें।<br>बिना डॉक्टर से पूछे दवा न लें: अपनी मर्जी से कोई भी सप्लीमेंट न खाएं। सबसे पहले ब्लड टेस्ट करवाएं और डॉक्टर की सलाह लें। वे आपकी टेस्ट रिपोर्ट के आधार पर सही डोज बताएंगे।<br>नेचुरल तरीकों को अपनाएं: अपने शरीर के लिए जरूरी विटामिन-D का ज्यादातर हिस्सा प्राकृतिक धूप से लेने की कोशिश करें। इसके अलावा अपनी डाइट में फैटी फिश, अंडे की जर्दी और फोर्टिफाइड दूध जैसी चीजों को शामिल करें।</p>
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