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	<title>लाइफ-मंत्रा &#8211; UP Digital Diary</title>
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	<description>Hindi News &#38; Views</description>
	<lastBuildDate>Fri, 24 Jul 2026 05:08:38 +0000</lastBuildDate>
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	<title>लाइफ-मंत्रा &#8211; UP Digital Diary</title>
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		<title>आपकी थाली बढ़ा रही है ग्लोबल वार्मिंग! बुजुर्गों का इसमें ज्यादा योगदान</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102797</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 24 Jul 2026 05:08:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[क्या आपने कभी सोचा है कि हम रोज जो खाना खा रहे हैं, उसका भी जलवायु परिवर्तन पर असर पड़ रहा है? अगर नहीं तो हाल ही की स्टडी इस बारे में खुलासा कर रही है। इसमें भी उन देशों का योगदान सबसे ज्यादा है जिनका रहन-सहन और आय का स्तर हाई है। बता दें &#8230;]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">क्या आपने कभी सोचा है कि हम रोज जो खाना खा रहे हैं, उसका भी जलवायु परिवर्तन पर असर पड़ रहा है? अगर नहीं तो हाल ही की स्टडी इस बारे में खुलासा कर रही है। इसमें भी उन देशों का योगदान सबसे ज्यादा है जिनका रहन-सहन और आय का स्तर हाई है। बता दें कि हाल में फूड जर्नल में प्रकाशित हुई एक स्टडी के मुताबिक, जहां एक तरफ ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में किशोरों और युवाओं का सबसे बड़ा हाथ बताया जाता था तो अब इसमें बुजुर्ग भी शामिल हो गए हैं।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">बुजुर्गों का ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में योगदान</h2>



<p class="wp-block-paragraph">यह स्टडी बताती है कि दुनिया भर में खाने-पीने से जुड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में किशोरों और युवाओं का सबसे बड़ा हाथ है, लेकिन अब ज्यादा उम्र के लोग भी ग्लोबल डाइटरी ग्रीनहाउस गैस (सीएचजी) उत्सर्जन में तेजी से योगदान करने लगे हैं। ऐसा खासकर ज्यादा आय वाले देशों में देखा जा रहा है।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">भारत का भी नाम शामिल&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">इसमें ज्यादा आय वाले देशों के साथ ज्यादा जनसंख्या वाले देशों का नाम भी शामिल है। स्टडी में बताया गया है कि दुनिया के दो सबसे अधिक आबादी वाले देशों, भारत और चीन में खाने-पीने से होने वाले उत्सर्जन में बढ़ोतरी की मुख्य वजह क्रमशः डेयरी उत्पादों और मांस का सेवन था। इससे पता चलता है कि भारत में, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन में बढ़ोतरी डेयरी उत्पादों की वजह से हुई। 2019 में सभी उम्र के लोगों में खाने-पीने से होने वाले कुल उत्सर्जन में बढ़ोतरी का 90 प्रतिशत से अधिक और कुल उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा इन्हीं उत्पादों का था। चीन में, 2019 में किशोरों और युवाओं, दोनों के लिए प्रति व्यक्ति खाने-पीने से होने वाले कुल उत्सर्जन में मांस से जुड़े उत्सर्जन का हिस्सा 40 प्रतिशत से अधिक था।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">खानपान कैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में शामिल?&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">अब सवाल यह है कि आखिर हमारा खानपान कैसे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से जुड़ा हुआ है तो बता दें कि ग्लोबल डाइटरी ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का संबंध हमारे खान-पान और भोजन उत्पादन से वायुमंडल में फैलने वाली मीथेन, कार्बन डाइआक्साइड और नाइट्रस आक्साइड जैसी गैसों से है। ब्रिटेन की बर्मिंघम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पालिसी बनाने वालों से कहा है कि वे फूड सिस्टम और सस्टेनेबिलिटी पर इसके असर पर ध्यान दें। यह शोध नेचर फूड जर्नल में प्रकाशित हुआ है।&nbsp;</p>
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		<title>भारत में लोग औसतन 10.6 साल बीमारियों में बिताने को मजबूर</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102765</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 23 Jul 2026 05:32:15 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[इंसान की उम्र तो लंबी हो रही है, लेकिन सेहत की डोर कमजोर पड़ती जा रही है। विज्ञान और तकनीक की तरक्की ने हमें जीवन के कुछ अतिरिक्त साल तो दिए हैं, मगर ये साल खुशहाली के बजाय बीमारियों और लाचारी के साये में बीत रहे हैं। मेडिकल जर्नल &#8220;द लैंसेट पब्लिक हेल्थ&#8221; में प्रकाशित &#8230;]]></description>
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<p class="wp-block-paragraph">इंसान की उम्र तो लंबी हो रही है, लेकिन सेहत की डोर कमजोर पड़ती जा रही है। विज्ञान और तकनीक की तरक्की ने हमें जीवन के कुछ अतिरिक्त साल तो दिए हैं, मगर ये साल खुशहाली के बजाय बीमारियों और लाचारी के साये में बीत रहे हैं। मेडिकल जर्नल &#8220;द लैंसेट पब्लिक हेल्थ&#8221; में प्रकाशित &#8220;ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज&#8221; 2023 के अध्ययन में यह कड़वी सच्चाई सामने आई है कि 1990 के बाद से दुनिया भर में &#8220;मार्बिडिटी गैप&#8221; यानी कुल जीवन प्रत्याशा और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा के बीच का अंतर तेजी से बढ़ा है।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">स्वस्थ जीवन प्रत्याशा और कुल जीवन प्रत्याशा के बीच अंतर बढ़ा&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">साल 2023 में दुनिया भर में लोग अपनी कुल जिंदगी का औसतन 14.5 प्रतिशत हिस्सा अस्वस्थता में बिता रहे हैं, जो 1990 में 13.6 प्रतिशत था। यह अंतर केवल जीवन के आखिरी पड़ाव में ही नहीं, बल्कि पूरी वयस्कता के दौरान भी देखा जा रहा है। अध्ययन से पता चला है कि 2023 में स्वस्थ जीवन प्रत्याशा और कुल जीवन प्रत्याशा के बीच 10.7 साल का अंतर था, जो 1990 में 8.8 साल था। इससे पता चलता है कि दुनिया भर में लोग ज्यादा समय तक जी तो रहे हैं, लेकिन खराब सेहत के साथ ज्यादा साल बिता रहे हैं।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">भारत में बढ़ी उम्र, लेकिन बीमारियों का दायरा भी फैला&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">1990 में भारत में कुल जीवन प्रत्याशा 58.5 साल और स्वस्थ जीवन प्रत्याशा 50.1 साल थी, यानी अस्वस्थता का अंतर 8.4 साल था। 2023 तक आते-आते भारत की औसतन जीवन प्रत्याशा तो बढ़कर 71.6 साल हो गई, लेकिन स्वस्थ जीवन प्रत्याशा केवल 61.0 साल तक ही पहुंच सकी। इसका मतलब यह है कि आज भारतीय जीवन के औसतन 10.6 साल बीमारियों व शारीरिक अक्षमताओं के बीच गुजारने पर मजबूर है।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">महिलाओं की लंबी जिंदगी पर अस्वस्थता का भारी साया&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">यह भी सामने आया है कि दुनिया के हर कोने में महिलाएं पुरुषों की तुलना में लंबी जिंदगी तो जी रही हैं, लेकिन उनका एक बड़ा हिस्सा अस्वस्थता में बीत रहा है। 2023 के आंकड़ों के अनुसार, महिलाओं का मार्बिडिटी गैप 12.1 साल दर्ज किया गया, जबकि पुरुषों के लिए यह 9.3 साल रहा। भारत में पुरुषों का अस्वस्थता गैप 1990 के 7.5 साल से बढ़कर 2023 में 9.1 साल हो गया। वहीं, महिलाओं के लिए यह अंतर 1990 में 9.4 साल था, जो 2023 में बढ़कर 12 साल पहुंच गया।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">पीठ दर्द, मानसिक तनाव एवं जीवनशैली बनीं बड़ी वजहें</h2>



<p class="wp-block-paragraph">दुनिया में महिला और पुरुष दोनों के लिए स्वस्थ जीवन छीनने में बड़ा योगदान मांसपेशियों और हड्डियों के विकारों (विशेषकर कमर व पीठ के निचले हिस्से का दर्द) का रहा है। इसके बाद अवसाद और चिंता जैसे मानसिक विकार बड़ी वजह बनकर उभरे हैं। वैश्विक स्तर पर हाई फास्टिंग ब्लड शुगर व हाई बाडी मास इंडेक्स (मोटापा) ऐसे जोखिम कारक हैं जो सेहत को दीमक की तरह चाट रहे हैं।</p>



<h2 class="wp-block-heading">लंबी उम्र नहीं, सेहतमंद जीवन हो प्राथमिकता</h2>



<p class="wp-block-paragraph">वरिष्ठ लेखक क्रिस्टोफर मरे ने कहा, &#8220;हमारी खोज यह दर्शाती है कि भविष्य में जनस्वास्थ्य में सुधार केवल लोगों को लंबा जीवन जीने में मदद करने से नहीं, बल्कि उन्हें स्वस्थ जीवन जीने में मदद करने से आएगा। स्वस्थ उम्र बढ़ने की प्रगति को केवल &#8220;जीवनकाल&#8221; से नहीं, बल्कि &#8220;स्वस्थ जीवनकाल से मापा जाना चाहिए।&#8221;</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>क्यों 20 साल की उम्र में ही कमजोर हो रही है लोगों की याददाश्त?</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102749</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 22 Jul 2026 05:56:29 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[लाइफ-मंत्रा]]></category>
		<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[क्या आपके साथ ऐसा होता है कि फोन आपकी जेब में ही है, लेकिन आप उसे इधर-उधर ढूंढ़ रहे हैं या कोई काम करने उठे थे, लेकिन अब याद नहीं आ रहा कि क्या करना था? अगर हां, तो आप अकेले नहीं है। आज 20-30 साल की उम्र के युवाओं में भी छोटी-छोटी बातें भूलने &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">क्या आपके साथ ऐसा होता है कि फोन आपकी जेब में ही है, लेकिन आप उसे इधर-उधर ढूंढ़ रहे हैं या कोई काम करने उठे थे, लेकिन अब याद नहीं आ रहा कि क्या करना था? अगर हां, तो आप अकेले नहीं है। आज 20-30 साल की उम्र के युवाओं में भी छोटी-छोटी बातें भूलने की समस्या काफी कॉमन हो गई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">हालांकि, कभी-कभार बातें भूलना नॉर्मल है, लेकिन अगर आपके साथ ऐसा बार-बार हो रहा है, तो आपको सतर्क हो जाना चाहिए। हालांकि, ये किसी गंभीर बीमारी का संकेत हो, ऐसा जरूरी नहीं, लेकिन आपकी बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल का इशारा जरूर है। आइए वर्ल्ड ब्रेन डे के मौके पर डॉ. आदित्य गुप्ता (डायरेक्टर, न्यूरोसर्जरी एंड साइबरनाइफ, आर्टिमिस हॉस्पिटल, गुरुग्राम) से जानते हैं कि क्यों युवाओं में कमजोर याददाश्त की समस्या बढ़ रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्क्रीन टाइम और अधूरी नींद हैं सबसे बड़े दुश्मन<br></strong>कमजोर याददाश्त के पीछे सबसे बड़ा हाथ घंटों स्मार्टफोन देखने और अधूरी नींद का है। घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल करना, शॉर्ट वीडियो देखना या एक ऐप से दूसरे ऐप पर स्विच करते रहना, हमारे अटेंशन स्पैन को कम करता है। इससे दिमाग आसानी से भटक जाता है और चीजों को याद रखने के क्षमता कम हो जाती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसी तरह नींद पूरी न होने के कारण भी दिमाग पर असर पड़ता है। देर रात तक जागना, सोने का कोई फिक्स समय न होना और 7-8 घंटे से कम की नींद लेना हमारे दिमाग को रीसेट करने का टाइम नहीं देता। इसके कारण भी युवाओं की याददाश्त कमजोर हो रही है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>स्ट्रेस, खान-पान और बिगड़ती लाइफस्टाइल<br></strong>युवाओं पर पढ़ाई, करियर, पैसों और रिश्तों का काफी दबाव रहता है। इसके कारण स्ट्रेस हार्मोन्स बढ़ते हैं, जो फोकस करने की क्षमता को कम करते हैं। इस वजह से दिमाग कॉन्सनट्रेट नहीं कर पाता और चीजें याद रखना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, जंक फूड खाना, कार्बोनेटेड और स्वीट ड्रिंक्स पीना, पानी की कमी, एक्सरसाइज न करना और सिगरेट-शराब जैसी लत भी याददाश्त को प्रभावित करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">शरीर में कुछ पोषक तत्वों की कमी के कारण भी याददाश्त कमजोर होने लगती है। विटामिन-बी12 और विटामिन-डी दिमाग की सेहत के लिए जरूरी है। शरीर में इनका स्तर कम होने की वजह से भी याददाश्त कमजोर हो सकती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कैसे कर सकते हैं सुधार?<br></strong>सबसे अच्छी बात है कि इस स्थिति को बदला जा सकता है और इसके लिए आपको अपनी लाइफस्टाइल में बस कुछ सुधार करने होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph">रोज कम से 7 से 9 घंटे की गहरी नींद लें। इसके लिए सोने का एक समय फिक्स करें और बेड टाइम से कम से कम एक घंटा पहले फोन और सभी स्क्रीन बंद कर दें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">दिनभर फोन से चिपके रहने की आदत में सुधार करना होगा। एक स्क्रीन टाइम फिक्स करें कि आप इतनी देर से ज्यादा सोशल मीडिया नहीं देखेंगे या दिन में 1-2 घंटे की स्क्रीन ब्रेक टाइम बनाएं, जब आप बाहर पार्क में घूम सकें या म्युजिक सुन सकें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके साथ ही, डाइट में भी सुधार करना जरूरी है। अपने खाने में साबुत अनाज, फल, सब्जियां, दालें, अंडा, दूध और मछली जैसे फूड्स शामिल करें। रोजाना 7-8 गिलास पानी पिएं और एक्सरसाइज जरूर करें। दिमाग की फोकस करने की क्षमता बढ़ाने के लिए मेडिटेशन करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डॉक्टर से सलाह कब लें?<br></strong>अगर भूलने की समस्या ज्यादा बढ़ गई है, जो आपके रोजमर्रा के कामों में रुकावट डाल रही है या भूलने के साथ व्यवहार में भी बदलाव आ रहा है, तो इसे नजरअंदाज न करें और तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें, ताकि सही समय पर इलाज हो सके।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>देर रात तक जागने और खाने की आदत बिगाड़ती है आपका मेटाबॉलिज्म</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102708</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 21 Jul 2026 08:07:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[आजकल रात-रात भर जागना हमारी दिनचर्या का एक आम हिस्सा बन गया है। हम सभी यह सुनते आए हैं कि देर रात तक जागना सेहत के लिए अच्छा नहीं है, फिर भी हम अक्सर इसके दुष्प्रभावों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हाल ही में हुए एक नए शोध ने इस आदत को लेकर खतरे &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">आजकल रात-रात भर जागना हमारी दिनचर्या का एक आम हिस्सा बन गया है। हम सभी यह सुनते आए हैं कि देर रात तक जागना सेहत के लिए अच्छा नहीं है, फिर भी हम अक्सर इसके दुष्प्रभावों को नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन हाल ही में हुए एक नए शोध ने इस आदत को लेकर खतरे की घंटी बजा दी है। अगर आपको भी देर रात तक जागने और कुछ न कुछ खाते रहने की आदत है, तो यह खबर आपके लिए बहुत जरूरी है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या कहता है नया शोध?<br></strong>&#8216;फ्रंटियर्स इन न्यूट्रिशन&#8217; जर्नल में हाल ही में एक शोध प्रकाशित हुआ है। इस स्टडी में यह साफ तौर पर सामने आया है कि जो लोग रात में देर तक जागते हैं और उस दौरान अधिक एनर्जी, कार्बोहाइड्रेट और फैट वाली चीजें खाते हैं, उनके शरीर में गंभीर बदलाव आ सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>ऐसे लोगों में नीचे बताई गई परेशानियां देखने को मिल सकती हैं:</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">शरीर में फैट का कुल प्रतिशत बढ़ना<br>पेट की चर्बी में इजाफा<br>ब्लड शुगर के स्तर का बढ़ना<br>लिपिड लेवल का अधिक होना</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>समय का है सारा खेल<br></strong>इस रिसर्च को ग्रिफिथ यूनिवर्सिटी के &#8216;स्कूल ऑफ एलाइड हेल्थ, स्पोर्ट एंड सोशल वर्क&#8217; की शोधकर्ता रोजेन क्रूगर ने लीड किया है। उनका कहना है कि हमारे शरीर की बायोलॉजिकल क्लॉक हमारी खाने की पसंद, हमारे व्यवहार और मेटाबॉलिज्म पर बहुत गहरा असर डालती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अध्ययन में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि सुबह जल्दी उठने वाले लोग और देर रात तक जागने वाले लोग- दोनों ही दिनभर में लगभग एक जैसी ही मात्रा में खाना या एनर्जी लेते हैं। यानी, दोनों की खुराक में बहुत अंतर नहीं होता। असल समस्या यह है कि आप किस समय खा रहे हैं। सही समय पर भोजन न करना ही इस पूरी समस्या की असली जड़ है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>महिलाओं पर की गई खास स्टडी<br></strong>इस नतीजे तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने 18 से 45 साल की उम्र की 287 महिलाओं को अपने अध्ययन में शामिल किया था। इस दौरान महिलाओं के खान-पान की आदतों को बारीकी से देखा गया, जिसमें कई हैरान करने वाले पैटर्न सामने आए:</p>



<p class="wp-block-paragraph">सुबह कम आहार: जो महिलाएं देर रात तक जागती थीं, उनमें सुबह के वक्त कम एनर्जी और कम प्रोटीन वाला भोजन लेने की संभावना काफी ज्यादा देखी गई।<br>रात में अनहेल्दी खान-पान: सुबह कम खाने की भरपाई ये महिलाएं अक्सर रात में करती थीं। वे देर रात में ज्यादा एनर्जी, अधिक कार्बोहाइड्रेट और फैट से भरपूर चीजें खाती पाई गईं।<br>पोषक तत्वों की कमी: शाम और रात के समय ज्यादा एक्टिव रहने वाली महिलाओं ने उन महिलाओं (जो सुबह या दिन के बीच में एक्टिव रहती हैं) की तुलना में कम माइक्रोन्यूट्रिएंट और कम एनर्जी वाले खाद्य पदार्थों का सेवन किया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">कुल मिलाकर, यह अध्ययन हमें स्पष्ट रूप से चेतावनी देता है कि सिर्फ यह मायने नहीं रखता कि हम कितना खा रहे हैं, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हम &#8216;कब&#8217; खा रहे हैं। देर रात की आदतें और उस वक्त का खान-पान हमारे शरीर के मेटाबॉलिज्म को सीधे तौर पर प्रभावित करता है।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>जलवायु परिवर्तन से बेकाबू हो रहे पानी में फैलने वाले बैक्टीरिया</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102671</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Jul 2026 04:55:48 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[सोचिए, अगर बीमारियों के खिलाफ दशकों से लड़ी जा रही हमारी जंग अचानक हार में बदलने लगे तो क्या होगा? जलवायु परिवर्तन सिर्फ बढ़ते तापमान का खेल नहीं है, इसकी वजह से बार-बार आ रहीं चरम मौसम की घटनाएं पानी से फैलने वाली बीमारियों को रोकने के लिए दुनिया भर में की गई दशकों की &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">सोचिए, अगर बीमारियों के खिलाफ दशकों से लड़ी जा रही हमारी जंग अचानक हार में बदलने लगे तो क्या होगा? जलवायु परिवर्तन सिर्फ बढ़ते तापमान का खेल नहीं है, इसकी वजह से बार-बार आ रहीं चरम मौसम की घटनाएं पानी से फैलने वाली बीमारियों को रोकने के लिए दुनिया भर में की गई दशकों की मेहनत और प्रगति पर पानी फेर रही हैं। रोगजनकों को पनपने का नया माहौल मिल रहा है, जिससे संक्रामक बीमारियों पर काबू पाना अब पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>5 साल से कम उम्र के बच्चों पर सबसे बड़ा खतरा<br></strong>पानी से होने वाली बीमारियां हमेशा से ही सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती रही हैं। आंकड़े बताते हैं कि:</p>



<p class="wp-block-paragraph">ये बीमारियां खासतौर पर कम और मध्यम आय वाले देशों में अधिक तबाही मचाती हैं।<br>5 साल से कम उम्र के बच्चों में होने वाली मौतों का यह एक बेहद बड़ा और गंभीर कारण हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>हर पैथोजन पर एक जैसा असर नहीं<br></strong>जलवायु परिवर्तन और बीमारी फैलाने वाले सूक्ष्मजीवों का रिश्ता काफी पेचीदा है। शोध से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन सभी रोगजनकों पर एक जैसा असर नहीं डालता।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>यह उन पर्यावरणीय स्थितियों को बदल रहा है, जिनसे यह तय होता है कि:</strong></p>



<p class="wp-block-paragraph">पैथोजन वातावरण में जीवित रह पाएंगे या नहीं,<br>वे कितनी तेजी से और कहां तक फैलेंगे,<br>और क्या वे नए होस्ट को संक्रमित करने में सक्षम होंगे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>क्या कहती है अमेरिकी यूनिवर्सिटीज की रिसर्च?<br></strong>अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो एंशुट्ज और यूनिवर्सिटी ऑफ वाशिंगटन के शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि जलवायु परिवर्तन पूरी दुनिया में जल जनित बीमारियों के प्रसार के पैटर्न को बदल रहा है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अध्ययनकर्ता एलिजाबेथ कार्लटन कहते हैं, &#8220;हम चाहते हैं कि लोग इस बात को समझें कि जलवायु परिवर्तन उन स्थितियों में बदलाव कर रहा है जो पैथोजन को फैलने में मदद करती हैं। यह उनके पनपने के अनुकूल माहौल तैयार कर रहा है, जिससे दुनिया की सबसे खतरनाक संक्रामक बीमारियों को नियंत्रित करना बेहद मुश्किल होता जा रहा है।&#8221;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अब पैथोजन के हिसाब से बनानी होगी रणनीति<br></strong>चूंकि बैक्टीरिया, वायरस और पैरासाइट बदलते पर्यावरणीय हालातों पर अलग-अलग तरह से प्रतिक्रिया देते हैं, इसलिए इनसे निपटने का पुराना तरीका अब काम नहीं आएगा। शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के इस दौर में बीमारियों पर नियंत्रण पाने के लिए अब पैथोजन के हिसाब से ही नीतियां और रणनीतियां बनानी होंगी।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>दवा ही नहीं, अब समंदर भी कर रहा है मेंटल हेल्थ का इलाज!</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102636</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 19 Jul 2026 04:59:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[विश्व स्वास्थ्य संगठन की भाषा में मेंटल हेल्थ को समझें तो एक मानसिक रूप से सेहतमंद इंसान अपनी क्षमता को जानता है, रोजाना के तनाव को झेल सकता है और प्रोडक्टिविटी के साथ काम भी कर सकता है। पर लोगों की मानसिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोरी होती जा रही है, तभी तो इन दिनों ट्ब्लू स्पेस &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">विश्व स्वास्थ्य संगठन की भाषा में मेंटल हेल्थ को समझें तो एक मानसिक रूप से सेहतमंद इंसान अपनी क्षमता को जानता है, रोजाना के तनाव को झेल सकता है और प्रोडक्टिविटी के साथ काम भी कर सकता है। पर लोगों की मानसिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोरी होती जा रही है, तभी तो इन दिनों ट्ब्लू स्पेस जैसी थेरेपी भी दवा की तरह काम कर रही हैं। आइए जानते हैं आखिर क्या है ब्लू स्पेस थेरेपी और क्यों इसे मेंटल हेल्थ से जोड़कर देखा जा रहा है।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">क्या है ब्लू स्पेस थेरेपी?&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">मेंटल हेल्थ से जुड़े मामले डिजिटल दौर में तेजी से बढ़ रहे हैं, इससे पहले तो किसी ने डिप्रेशन, अकेलेपन और एंग्जायटी जैसी बीमारियों के नाम सुने भी नहीं थे। लेकिन अब हर कोई इन नामों को जानने के साथ-साथ इनके बुरे अनुभव से भी गुजर रहा है। इसी वजह से ब्लू स्पेस थेरेपी ट्रेंड में है जिसके नाम से थोड़ा बहुत आयडिया तो लग ही गया होगा। यहां ब्लू स्पेस से मतलब पानी से जुड़ी चीजों से है, जैसे- झील, नदी और समंदर।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">कई रिपोर्ट्स में यह बात निकलकर सामने आई है कि ब्लू स्पेस के ज्यादा संपर्क में रहने से मेंटल हेल्थ अच्छी रहती है। रिपोर्ट्स तो यह भी बताती है कि तटीय इलाकों में रहने वाले और वहां जाने वाले लोगों में साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस यानी मेंटल हेल्थ से जुड़ी परेशानियां बहुत कम देखी गई।&nbsp;</p>



<h3 class="wp-block-heading">किताब ने भी किया साबित&nbsp;</h3>



<p class="wp-block-paragraph">साल 2014 में मरीन बायोलॉजिस्ट वालेस जे. निकोलस की किताब ब्लू माइंड आई थी, इस किताब में भी यह साबित किया गया था कि पानी के आसपास रहने से स्ट्रेस हॉर्मोन कोर्टिसोल कम होता है और व्यक्ति खुद को लेकर पॉजिटिव महसूस करने लगता है।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">पानी के अंदर थेरेपी</h2>



<p class="wp-block-paragraph">वैसे तो ब्लू स्पेस थेरेपी पानी के आसपास रहने से दिखने वाले पॉजिटिव बदलावों की बात करती है, पर अब इसके फायदों को देखते हुए पानी के अंदर भी इस थेरेपी को दिया जाने लगा है। विदेशों में डिप्रेशन, ट्रॉमा और नशे की लत जैसी दिक्कतों को दूर करने के लिए स्कूबा और फ्री-डाइविंग, वेटलेसनेस के अनुभव, ब्रीदवर्क के साथ मेडिटेशन जैसी थेरेपी लोगों को दी जा रही हैं। इसमें वेटलेसनेस का एहसास सबसे खास है जो नर्वस और ब्रेन सिस्टम को दोबारा से रेगुलेट करने में मदद करता है।&nbsp;</p>
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		<item>
		<title>अब केवल मानसून की बीमारी नहीं रहा डेंगू! मामूली वायरल बुखार समझकर न करें इग्नोर</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102611</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Jul 2026 05:45:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[दशकों तक भारत में डेंगू को एक ऐसी बीमारी माना जाता रहा है, जिसकी चिंता लोग केवल मानसून के दौरान, यानी जून से सितंबर के बीच ही करते हैं। इस मौसम में जब सड़कों पर जलभराव होता है और जगह-जगह पानी जमा हो जाता है, तो हर गली-मोहल्ला मच्छरों के पनपने की जगह बन जाता &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">दशकों तक भारत में डेंगू को एक ऐसी बीमारी माना जाता रहा है, जिसकी चिंता लोग केवल मानसून के दौरान, यानी जून से सितंबर के बीच ही करते हैं। इस मौसम में जब सड़कों पर जलभराव होता है और जगह-जगह पानी जमा हो जाता है, तो हर गली-मोहल्ला मच्छरों के पनपने की जगह बन जाता है। इसलिए बारिश के मौसम में पानी की टंकियों को ढकने, मच्छरदानी का इस्तेमाल करने और अक्टूबर के बाद निश्चिंत हो जाने जैसी सलाह दी जाती रही है। लेकिन अब यह सोच पुरानी हो चुकी है, क्योंकि डेंगू अब केवल मानसून तक सीमित रहने वाली बीमारी नहीं रहा। आइए सीके बिरला हॉस्पिटल, गुड़गांव से एसोसिएट डायरेक्टर &#8211; इंटरनल मेडिसिन, डॉ. तुषार तायल से जानते हैं कि आखिर क्यों डेंगू हर मौसम में फैल रहा है और इसको पहचानने के साथ-साथ रोकथाम के लिए क्या किया जाना चाहिए।&nbsp;</p>



<h2 class="wp-block-heading">डेंगू के मामले बढ़े&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">भारत में डेंगू के मामलों की बात करें तो फरवरी 2026 के आखिर तक ही करीब 6,927 मामले दर्ज किए जा चुके थे, जो असामान्य रूप से ज्यादा हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि पहले ऐसा माना जाता था कि फरवरी महीने में डेंगू कम फैलता है। इतना ही नहीं, महामारी एक्स्पर्ट्स का कहना है कि यह संख्या 2021 में जनवरी से मई के बीच दर्ज कुल मामलों से भी ज्यादा थी और 2022 की इसी अवधि के आंकड़ों के करीब पहुंच चुकी थी, जबकि मानसून अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ था।</p>



<h2 class="wp-block-heading">डेंगू के बढ़ते मामलों की वजह&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">डेंगू के बढ़ते मामलों की बात करें तो इसके पीछे कोई ऐसे कारण नहीं हैं जिनपर रोक नहीं लगाई जा सकती। ये काफी हद तक हमारी अपनी गतिविधियों से ही जुड़े हैं। पहली वजह तो यह कि बढ़ते तापमान के कारण अब मच्छरों का प्रजनन चक्र सर्दियों में भी पूरी तरह नहीं रुकता। वहीं, गर्म मौसम मच्छरों की सक्रिय अवधि को मानसून से पहले और बाद तक बढ़ा देता है। इसके अलावा, अनियमित बारिश, कभी बहुत तेज़ बारिश, कभी लंबे सूखे के बाद अचानक होने वाली बरसात, पूरे साल अलग-अलग समय पर पानी जमा होने की स्थिति पैदा करती है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इसके साथ ही तेज़ी से हो रहा शहरीकरण भी समस्या को बढ़ा रहा है। निर्माण स्थल, छतों पर रखी पानी की टंकियां, फेंके हुए टायर और खुले नाले अब पूरे साल मच्छरों के प्रजनन के लिए अनुकूल जगह उपलब्ध कराते हैं, केवल चार महीने नहीं। भारतीय शहरों पर अध्ययन कर रहे सार्वजनिक स्वास्थ्य शोधकर्ताओं ने भी संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन और अव्यवस्थित शहरी विकास के कारण डेंगू का भौगोलिक और मौसमी दायरा लगातार बढ़ रहा है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">डेंगू की रोकथाम के लिए सलाह&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">इसका सीधा संदेश यह है कि अब मच्छरों की रोकथाम केवल मानसून के दौरान की जाने वाली जिम्मेदारी नहीं रह गई है। कूलर का पानी खाली करना, पानी के बर्तनों और टंकियों को ढककर रखना, गमलों की ट्रे में जमा पानी हटाना और छत पर पड़े कबाड़ या कचरे की नियमित सफाई पूरे साल की आदत बननी चाहिए, न कि केवल बारिश के मौसम की तैयारी।</p>



<p class="wp-block-paragraph">डॉक्टर यह भी सलाह देते हैं कि दिसंबर या फरवरी में बुखार, जोड़ों में दर्द या शरीर पर चकत्तों को केवल &#8220;मौसमी वायरल&#8221; समझकर नजरअंदाज न करें। सिर्फ इसलिए कि मानसून नहीं है, यह मान लेना सही नहीं होगा कि डेंगू नहीं हो सकता, क्योंकि अब धीरे-धीरे ऐसा कोई निश्चित &#8220;डेंगू सीजन&#8221; बचा ही नहीं है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">यहां एक सावधानी की बात भी समझना जरूरी है। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि हर साल डेंगू के मामलों की संख्या में काफी उतार-चढ़ाव हो सकता है। किसी एक साल में बड़ा प्रकोप आने के बाद लोगों में उस समय सक्रिय वायरस स्ट्रेन के खिलाफ अस्थायी प्रतिरक्षा विकसित हो जाती है, जिससे अगले साल मामलों में कमी देखी जा सकती है। लेकिन बाद में जब कोई दूसरा वायरस सीरोटाइप फैलता है, तो मामले फिर बढ़ सकते हैं। इसलिए किसी एक साल मामलों में कमी आने का मतलब यह नहीं है कि डेंगू की समस्या खत्म हो गई है।</p>



<h2 class="wp-block-heading">डेंगू की पहचान कैसे करें?&nbsp;</h2>



<p class="wp-block-paragraph">अगर बुखार एक दिन से अधिक बना रहे, तो अपने नज़दीकी डॉक्टर से जरूर संपर्क करें। यह मानकर न चलें कि यह केवल मौसम बदलने की वजह से हुआ साधारण बुखार है या गर्म सूप पीने से ठीक हो जाएगा। आपको यह नहीं पता हो सकता कि यह डेंगू है या वास्तव में सिर्फ मौसम का असर।</p>



<p class="wp-block-paragraph">इस सोच को खत्म कर दें कि डेंगू कैलेंडर के हिसाब से फैलने वाली बीमारी है। बस हमें यह समझने में इतना समय लग गया कि इसके लिए कोई तय मौसम नहीं होता।</p>
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		<item>
		<title>मानसून नें बढ़ रहा Influenza-A और COVID-19 जैसे इन्फेक्शन का खतरा</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102581</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 17 Jul 2026 05:04:58 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[मानसून आते ही रेस्पिरेट्री इन्फेक्शन के मामलों में काफी उछाल आ जाता है, खासकर इन्फ्लुएंजा-ए, कोविड-19 और एच1एन1 के मामलों में। हवा में नमी बढ़ने की वजह से वायरस तेजी से बढ़ते हैं और यही वजह कि इस मौसम में ये इन्फेक्शन तेजी से फैलते हैं।&#160; अक्सर लोग इन्हें मामूली सर्दी-जुकाम समझकर नजरअंदाज कर देते &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">मानसून आते ही रेस्पिरेट्री इन्फेक्शन के मामलों में काफी उछाल आ जाता है, खासकर इन्फ्लुएंजा-ए, कोविड-19 और एच1एन1 के मामलों में। हवा में नमी बढ़ने की वजह से वायरस तेजी से बढ़ते हैं और यही वजह कि इस मौसम में ये इन्फेक्शन तेजी से फैलते हैं।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph">अक्सर लोग इन्हें मामूली सर्दी-जुकाम समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो बाद में गंभीर रूप ले सकता है। आइए&nbsp;<em><strong>डॉ. प्रदीप बजाद</strong></em>&nbsp;(सीनियर कंसल्टेंट, अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद) से जानें इनके लक्षण कैसे होते हैं और बचाव के लिए आप क्या कर सकते हैं।&nbsp;&nbsp;</p>



<h3 class="wp-block-heading">क्यों बढ़ जाता है इन्फेक्शन का खतरा?&nbsp;</h3>



<p class="wp-block-paragraph">सबसे पहले इन्फेक्शन का खतरा बढ़ने की वजह समझना जरूरी है। बारिश के मौसम में हवा में नमी ज्यादा होती है, जो वायरस के पनपने के लिए अनुकूल है। ऐसे में ऑफिस, स्कूल या पब्लिक ट्रांसपोर्ट जैसे बंद जगहों पर वेंटिलेशन की कमी के कारण खांसने, छींकने या बात करते समय, ये वायरस तेजी से एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकते हैं।&nbsp;</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>किन लक्षणों से सावधान रहना जरूरी है?<br></strong>इन्फ्लुएंजा-ए, एच1एन और कोविड-19 के लक्षण काफी हद तक एक-दूसरे से मिलते-जुलते होते हैं, जैसे तेज बुखार, लगातार खांसी, गले में दर्द, बदन दर्द, सिरदर्द, थकान, बंद नाक। कुछ मामलों में उल्टी या डायरिया और सांस लेने में तकलीफ या छाती में भारीपन महसूस होने जैसे लक्षण भी नजर आ सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगर ये लक्षण 48 घंटे में ठीक न हो, तो खुद से दवा लेने के बजाय, डॉक्टर को दिखाना ज्यादा बेहतर है। समय से टेस्ट करवाकर इलाज शुरू करना जरूरी है, वरना इन्फेक्शन गंभीर रूप भी ले सकता है।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>किन्हें है सबसे ज्यादा खतरा?<br></strong>हालांकि, ये इन्फेक्शन किसी भी व्यक्ति को हो सकते हैं, लेकिन कुछ लोगों को ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। 60 से ज्यादा उम्र के व्यक्ति, डायबिटीज, क्रोनिक हार्ट, लंग्स, या किसी दूसरी गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीज या ऐसे व्यक्ति जो इम्यूनोसप्रेसिव दवाएं ले रहे हैं, को ज्यादा सावधानी बरतनी चाहिए और किसी भी लक्षण को मामूली नहीं समझना चाहिए।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>इन्फेक्शन से बचाव के लिए क्या करना चाहिए?<br></strong>इन्फ्लुएंजा-ए और कोविड-19 की वैक्सीन लगवाएं। इन इन्फेक्शन से बचाव में वैक्सीन काफी असरदार है। साथ ही, भीड़भाड़ वाली और बंद जगहों पर मास्क का इस्तेमाल करें। हाइजीन का भी खास ध्यान रखें और अपने हाथों को नियमित रूप से साबुन से धोएं या सैनिटाइजर का इस्तेमाल करें।</p>



<p class="wp-block-paragraph">अगर कोई व्यक्ति बीमार है या खांस-छींक रहा है, तो उससे दूरी बनाएं और भरपूर मात्रा में फ्लूएड लें और इन्फेक्शन के किसी भी लक्षण को मामूली समझकर अनदेखा न करें।</p>
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		<item>
		<title>सिर्फ फैट कम करना काफी नहीं, कमजोर मांसपेशियां भी हैं डायबिटीज की बड़ी वजह</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102558</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 16 Jul 2026 05:37:39 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
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					<description><![CDATA[जिन लोगों के शरीर में वसा ज्यादा है और मांसपेशियों की सेहत खराब है, उनमें स्वस्थ शरीर संरचना वाले लोगों की तुलना में डायबिटीज होने का खतरा साढ़े तीन गुना से ज्यादा था। एक नए अध्ययन के अनुसार यह जानकारी सामने आई है। &#8220;डायबिटीज केयर&#8221; जर्नल में छपे अध्ययन के के नतीजों से पता चलता &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">जिन लोगों के शरीर में वसा ज्यादा है और मांसपेशियों की सेहत खराब है, उनमें स्वस्थ शरीर संरचना वाले लोगों की तुलना में डायबिटीज होने का खतरा साढ़े तीन गुना से ज्यादा था। एक नए अध्ययन के अनुसार यह जानकारी सामने आई है।</p>



<p class="wp-block-paragraph">&#8220;डायबिटीज केयर&#8221; जर्नल में छपे अध्ययन के के नतीजों से पता चलता है कि सार्कोपेनिक ओबेसिटी से ग्रस्त लोगों में जो शरीर में ज्यादा वसा या मोटापा और साथ ही कंकाली मांसपेशी और सार्कोपेनिया यानी फंक्शन का कम होना वाले लोगों में सिर्फ मोटापे वाले लोगों की तुलना में टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा 19% ज्यादा था। सिर्फ सार्कोपेनिया वाले लोगों की तुलना में डायबिटीज होने का खतरा 91% ज्यादा था।</p>



<h3 class="wp-block-heading">क्या डायबिटीज का कारण सिर्फ आपका वजन है?</h3>



<p class="wp-block-paragraph">आस्ट्रेलिया की कर्टिन यूनिवर्सिटी के मुख्य लेखक और पीएचडी उम्मीदवार झोंगयांग गुआन ने कहा कि ये नतीजे इस आम धारणा को चुनौती देते हैं कि डायबिटीज का खतरा मुख्य रूप से शरीर के वजन की वजह से होता है। गुआन ने कहा कि ज्यादातर लोग जानते हैं कि अतिरिक्त वजन उठाने से डायबिटीज टाइप 2 का जोखिम बढ़ सकता है, लेकिन निष्कर्ष दिखाते हैं कि मांसपेशियों की सेहत भी इस पहेली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। अध्ययन में यूके बायोबैंक के 4,79,607 ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिन्हें डायबिटीज नहीं थी। 14 साल से ज्यादा समय तक चले अध्ययन के दौरान लगभग 32,950 लोगों को डायबिटीज हो गई।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>फैट के साथ-साथ मांसपेशियों की सेहत पर भी दें ध्यान<br></strong>शोधकर्ताओं ने पाया कि सार्कोपेनिक ओबेसिटी वाले लगभग 15 प्रतिशत लोगों को 10 साल के अंदर टाइप 2 डायबिटीज हो गई, जबकि सिर्फ ओबेसिटी वाले लोगों में यह दर लगभग 11 प्रतिशत थी और सार्कोपेनिया या ओबेसिटी न होने वाले लोगों में यह दर सिर्फ तीन प्रतिशत थी। यह संबंध महिलाओं और 60 साल से कम उम्र के वयस्कों में खास तौर पर मजबूत देखा गया।</p>



<p class="wp-block-paragraph">लेखकों ने लिखा, &#8220;अकेले ओबेसिटी या सार्कोपेनिया की तुलना में सार्कोपेनिक ओबेसिटी में टाइप 2 डायबिटीज का जोखिम ज्यादा पाया गया, जो टाइप 2 डायबिटीज के जोखिम का पता लगाने के लिए मांसपेशियों की सेहत और शरीर में वसा की मात्रा की मिली-जुली जांच के महत्व को बताता है। कर्टिन यूनिवर्सिटी के हेल्थ साइंसेज फैकल्टी में प्रोफेसर और लेखक व प्रोजेक्ट के सीनियर लीड मारियो सिएर्वो ने कहा कि ये नतीजे डायबिटीज से बचाव के लिए एक व्यापक नजरिए का समर्थन करते हैं।</p>
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			</item>
		<item>
		<title>डाइट में दाल, राजमा और सोया प्रोडक्ट्स शामिल करने से 19% तक कम होगा High BP का रिस्क</title>
		<link>https://updigitaldiary.in/news-article/102525</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[UPDD Web]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 15 Jul 2026 05:44:11 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[हेल्थ एंड फिटनेस]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://updigitaldiary.in/?p=102525</guid>

					<description><![CDATA[अगर आप खाने में दाल, राजमा, मटर या टोफू के शौकीन हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए किसी खुशखबरी से कम नहीं है। दरअसल, &#8216;बीएमजे न्यूट्रिशन, प्रिवेंशन एंड हेल्थ&#8217; जर्नल में प्रकाशित एक हालिया विश्लेषण से पता चला है कि फलियों और सोया से बनी चीजों को अपनी डेली डाइट का हिस्सा बनाकर आप हाई &#8230;]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p class="wp-block-paragraph">अगर आप खाने में दाल, राजमा, मटर या टोफू के शौकीन हैं, तो यह आर्टिकल आपके लिए किसी खुशखबरी से कम नहीं है। दरअसल, &#8216;बीएमजे न्यूट्रिशन, प्रिवेंशन एंड हेल्थ&#8217; जर्नल में प्रकाशित एक हालिया विश्लेषण से पता चला है कि फलियों और सोया से बनी चीजों को अपनी डेली डाइट का हिस्सा बनाकर आप हाई ब्लड प्रेशर जैसी गंभीर समस्या को खुद से दूर रख सकते हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>डाइट से कैसे कंट्रोल होता है ब्लड प्रेशर?<br></strong>आमतौर पर जब किसी का ब्लड प्रेशर लगातार 130/80 mm Hg या उससे ज्यादा रहता है, तो उसे हाई ब्लड प्रेशर की कैटेगरी में रखा जाता है। यह बीमारी आज कितनी आम हो चुकी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका के लगभग 50 फीसदी वयस्क इस समस्या की चपेट में हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph">पहले हुए कई वैज्ञानिक शोध यह साबित कर चुके हैं कि सोया और फलियां खाने से कार्डियोवैस्कुलर डिजीज का खतरा कम होता है। इसी बात से प्रेरित होकर, वैज्ञानिक अब यह गहराई से जानना चाहते थे कि क्या ये चीजें सीधे तौर पर ब्लड प्रेशर को भी नॉर्मल रखने में कारगर हैं।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>हाई बीपी और खान-पान का सीधा कनेक्शन<br></strong>इस सवाल का सटीक जवाब ढूंढने के लिए शोधकर्ताओं ने 12 अलग-अलग स्टडीज के डेटा का बारीकी से विश्लेषण किया। इस अध्ययन में ऐसे दसियों हजार लोग शामिल थे, जिनमें से कुछ हाई बीपी के मरीज थे और कुछ बिल्कुल स्वस्थ। जब इन सभी प्रतिभागियों के खान-पान की आदतों को खंगाला गया, तो नतीजे काफी पॉजिटिव थे।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>कितनी मात्रा से मिलेगा फायदा?<br></strong>शोध के आंकड़ों के अनुसार, यह बात सामने आई कि फलियों और सोया की मात्रा सीधे तौर पर बीपी के खतरे को कम करने से जुड़ी है:</p>



<p class="wp-block-paragraph">फलियों का सेवन: जो लोग रोजाना करीब 170 ग्राम यानी लगभग 1.7 कप फलियां खा रहे थे, उनमें हाई बीपी विकसित होने का जोखिम उन लोगों की तुलना में 16% कम पाया गया, जो नाममात्र का सेवन कर रहे थे।<br>सोया प्रोडक्ट्स का कमाल: बात अगर सिर्फ सोया प्रोडक्ट्स की करें, तो रोजाना महज 60 से 80 ग्राम सोया खाने वालों में यह खतरा 19% तक घट गया।<br>इस अध्ययन ने एक &#8216;डोज-रिस्पॉन्स रिलेशनशिप&#8217; की पुष्टि की है। इसका सीधा मतलब यह है कि एक उचित और संतुलित मात्रा के भीतर, आप इन फूड्स का जितना ज्यादा सेवन करेंगे, हाइपरटेंशन यानी हाई बीपी होने की संभावना उतनी ही कम होती जाएगी।</p>



<p class="wp-block-paragraph"><strong>अपनी थाली को कैसे बनाएं सेहतमंद?<br></strong>इन चीजों को अपनी रोजाना की डाइट में शामिल करना बहुत आसान है:</p>



<p class="wp-block-paragraph">पोषक तत्वों से भरपूर फलियां: अपनी डाइट में हरी मटर और बीन्स के साथ-साथ छोले और अलग-अलग प्रकार की दालों को जगह दें।<br>सोया के ढेरों विकल्प: सोया का मतलब सिर्फ टोफू तक सीमित नहीं है। आप अपनी पसंद के अनुसार सोया मिल्क, टेम्पेह और मिसो जैसी स्वादिष्ट चीजों को भी चुन सकते हैं।</p>
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