जापान के बीचोबीच रूस ने कैसे बुना जासूसों का जाल?

फरवरी 2022 में जब रूसी सैनिकों ने यूक्रेन में प्रवेश किया, तो पश्चिमी देशों ने सैकड़ों संदिग्ध रूसी जासूसों को बाहर निकालकर और क्रेमलिन से जुड़ी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाकर अपनी कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। इसका मुख्य उद्देश्य मॉस्को की खुफिया जानकारी जुटाने की क्षमता को खत्म करना और हथियार उत्पादन के लिए आवश्यक माइक्रोचिप्स तथा ट्रांसमीटर जैसे महत्वपूर्ण पुर्जों की आपूर्ति को रोकना था।

लेकिन, द न्यूयॉर्क टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, निकाले गए इन जासूसों में से कई ने एक ऐसे देश में अपना नया ठिकाना बना लिया है, जिसकी उम्मीद शायद ही किसी को थी और वह देश जापान है। जापान के कमजोर जासूसी कानूनों और इसके उन्नत प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने इसे रूस की सैन्य जरूरतों के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत बना दिया है।

यूक्रेनी सरकार के अनुमान बताते हैं कि लगभग 90 प्रतिशत रूसी मिसाइलों और ड्रोनों में जापान में बने पुर्जों का इस्तेमाल किया गया है।

20वीं डायरेक्टोरेट और एअरोफ्लोत का कवर

इस पूरे नेटवर्क के केंद्र में रूस की सैन्य खुफिया इकाई 20वीं डायरेक्टोरेट है, जिसके बारे में दुनिया को बहुत कम जानकारी है। पश्चिमी खुफिया एजेंसियों के वर्तमान और पूर्व अधिकारियों के अनुसार, इस इकाई के अधिकारी राजनयिकों या व्यवसायियों के भेष में काम करते हैं। वे युद्धक्षेत्र से जुड़ी संवेदनशील तकनीक हासिल करते हैं या चुराते हैं और फिर उसकी रूस में तस्करी करते हैं।

टोक्यो में इस पूरे ऑपरेशन को चलाने वाले मुख्य व्यक्ति की पहचान मक्सिम व्लादिमीरोविच फिलचेनकोव के रूप में हुई है, जो रूसी सरकारी एयरलाइन एअरोफ्लोत में काम करने का दिखावा करता है।

इस कथित सप्लाई चेन की मानवीय कीमत बहुत भयानक रही है। रिपोर्ट के अनुसार, मई में एक रूसी Kh-101 क्रूज मिसाइल कीव में एक आवासीय इमारत से टकराई थी, जिसमें कम से कम 24 लोग मारे गए थे। जांचकर्ताओं को मिसाइल के गाइडेंस सिस्टम के मलबे में जापानी पुर्जे मिले थे, जबकि इन पुर्जों के रूस को निर्यात पर सख्त प्रतिबंध लागू है।

फर्जी दस्तावेजों और तीसरे देशों के जरिए तस्करी

एनवाईटी के अनुसार, 49 वर्षीय फिलचेनकोव ने फरवरी 2024 में टोक्यो में अपना पद संभाला था। यह वह समय था जब युद्ध ड्रोनों की तरफ मुड़ चुका था और रूस को नई तकनीक की सख्त जरूरत थी। चीन ने कुछ मदद जरूर की, लेकिन पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण रूस को विशेष मशीन टूल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स की भारी कमी खल रही थी।

रूस की सैन्य खुफिया एजेंसी के एक अनुभवी अधिकारी के रूप में, फिलचेनकोव पहले भी जापान में अपनी सेवाएं दे चुका था। उसने जापान और रूस के बीच माल की शिपिंग करने वाली लॉजिस्टिक्स कंपनियों के साथ अच्छे संबंध बना लिए थे। पश्चिमी अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि ऐसे संबंधों का फायदा उठाकर जासूस झूठे बहाने से और कभी-कभी फर्जी शिपिंग दस्तावेजों का उपयोग करके संवेदनशील तकनीक खरीदते हैं।

जापान उन डुअल-यूज तकनीक का दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है। सीधे रूस भेजने के बजाय, तस्कर वियतनाम जैसे तीसरे देशों के माध्यम से सामान भेजते हैं, जो मॉस्को के साथ व्यापार करने के इच्छुक हैं। यद्यपि एअरोफ्लोत को जापान में औपचारिक रूप से ब्लैकलिस्ट नहीं किया गया है, लेकिन पुर्जों की कमी के कारण वहां इसका संचालन बंद हो चुका है, फिर भी इसके बिजनेस पार्टनर अभी भी सक्रिय बताए जाते हैं।

यूक्रेन की लगातार चेतावनियां

यूक्रेन ने जापान के विदेश मंत्रालय के सामने इस मुद्दे को बार-बार उठाया है। केवल अप्रैल 2025 में ही, कीव ने कम से कम आठ औपचारिक राजनयिक पत्र भेजे थे, जिनमें नागरिकों पर हमलों से बरामद रूसी हथियारों में मिले जापानी पुर्जों के सबूत दिए गए थे। साल भर में लगभग आठ और पत्र भेजे गए, जिनमें सर्किट बोर्ड, ट्रांसमीटर और सेमीकंडक्टर जैसे बरामद पुर्जों की तस्वीरें और सूचियां शामिल थीं।

यूक्रेन के दस्तावेजों में निप्पॉन इलेक्ट्रिक कॉर्पोरेशन, पैनासोनिक और तोशिबा जैसी जापानी कंपनियों के नाम शामिल हैं। हालांकि, रिपोर्ट में कहा गया है कि ऐसा कोई सबूत नहीं है कि इनमें से किसी ने भी जानबूझकर सीधे रूस को आपूर्ति की हो। सभी कंपनियों ने गलत काम से इनकार किया है और कहा है कि वे जापान के निर्यात नियमों का पालन करती हैं। निप्पॉन ने स्पष्ट किया कि बताए गए पुर्जे बहुत पुराने थे और सालों से बेचे नहीं गए थे।

जापान का कड़ा कदम और खुफिया क्षमताओं में सुधार

जापान के अर्थव्यवस्था, व्यापार और उद्योग मंत्रालय ने कहा है कि उसने प्रतिबंधों से बचने को लेकर कंपनियों को चेतावनी जारी की है और रूस की मदद करने वाली दर्जनों विदेशी संस्थाओं को ब्लैकलिस्ट किया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अपनी खुफिया सेवाओं पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण, जापान को लंबे समय से विदेशी जासूसों के लिए एक आसान ठिकाना माना जाता रहा है।

देश में अभी भी कोई समर्पित विदेशी खुफिया एजेंसी नहीं है, लेकिन जापानी अधिकारी इस खतरे से अवगत हैं और खुफिया जानकारी जुटाने पर दशकों पुरानी सीमाओं को हटाने के लिए काम कर रहे हैं।

इन जासूसी आरोपों के बावजूद जापान ने यूक्रेन का पुरजोर समर्थन किया है। उसने हमले के दिन ही रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का समर्थन किया था और बाद में बुलेटप्रूफ जैकेट व हेलमेट जैसी सैन्य आपूर्ति भेजकर अपनी पुरानी नीतियों को बदला था।

वर्तमान प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची के नेतृत्व में, जापान ने अवैध निर्यात को रोकने और जासूसी का मुकाबला करने के लिए अपनी खुफिया क्षमताओं को मजबूत करने का एक नया कार्यक्रम भी शुरू किया है।

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