सकट चौथ व्रत में चंद्रमा को अर्घ्य देते समय न करें ये गलतियां, जानें विधि

माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी यानी सकट चौथ का व्रत संतान की लंबी आयु और खुशहाली के लिए रखा जाता है। साल 2026 में यह व्रत 6 जनवरी को मनाया जा रहा है। सकट चौथ का व्रत तब तक पूर्ण नहीं माना जाता, जब तक कि रात में चंद्रमा को अर्घ्य न दिया जाए। अर्घ्य देने का मतलब केवल जल चढ़ाना नहीं है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। अक्सर अनजाने में हम अर्घ्य देते समय कुछ ऐसी गलतियां कर देते हैं, जिससे व्रत का पूरा फल नहीं मिलता है, तो आइए जानते हैं अर्घ्य देने के सही नियम और वे गलतियां जिनसे बचना चाहिए।

चंद्र दर्शन समय – चंद्रोदय रात 09 बजे होगा।

अर्घ्य देते समय भूलकर भी न करें ये गलतियां
अर्घ्य देते समय सबसे बड़ी गलती यह होती है कि जल की धार सीधे पैरों पर गिरती है। ऐसा करना अशुभ माना जाता है। हमेशा किसी ऊंचे स्थान पर खड़े होकर अर्घ्य दें या नीचे कोई गमला या थाली रख लें, ताकि जल के छींटे पैरों पर न पड़ें। बाद में उस जल को किसी पौधे में डाल दें।
शास्त्रों के अनुसार, तांबे के बर्तन में दूध डालकर अर्घ्य देने की मनाही है। अगर आप जल में दूध मिला रहे हैं, तो चांदी, पीतल या कांसे के लोटे का उपयोग करें। तांबे के पात्र में केवल शुद्ध जल और तिल ही डालें।
अर्घ्य देते समय जमीन पर सीधे खड़े न हों।
अपने पैरों के नीचे आसन जरूर रखें।
जूते-चप्पल पहनकर अर्घ्य गलती से भी न दें।
केवल जल अर्पित न करें।
अर्घ्य के जल में सफेद तिल, अक्षत, सफेद फूल और थोड़ा सा दूध जरूर मिलाएं।
सकट चौथ में तिल का विशेष महत्व है, इसलिए पूजा में तिल का शामिल होना भी जरूरी है।
चंद्रमा को अर्घ्य देते समय जल की गिरती हुई धार के बीच से चंद्रमा के दर्शन करने चाहिए।

अर्घ्य देने का सही नियम
चंद्रमा के उदय होने के बाद ही अर्घ्य दें।
अर्घ्य देते समय ‘ॐ सोमाय नमः’ या ‘ॐ चंद्रमसे नमः’ मंत्र का जाप करें। साथ ही, अपनी संतान की सुरक्षा के लिए गणेश जी से प्रार्थना करें।
अर्घ्य को तीन बार में थोड़ा-थोड़ा करके अर्पित करना चाहिए।
अर्घ्य देने के बाद अपने ही स्थान पर खड़े होकर तीन बार परिक्रमा करें।

सकट चौथ व्रत का महत्व
सकट चौथ को ‘संकट हारिणी चतुर्थी’ कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा को मन का कारक माना गया है और गणेश जी बुद्धि के देवता हैं। जब हम चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं, तो हमारे मन के विकार दूर होते हैं और परिवार पर आने वाले संकट टल जाते हैं। इसके साथ ही संतान सुख की प्राप्ति होती है।

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