आधी रात से सिर्फ 85 सेकंड दूर… डूम्सडे क्लाक को क्यों कहा जाता है तबाही की घड़ी?

परमाणु वैज्ञानिकों ने ‘डूम्सडे क्लाक’ को आधी रात से केवल 85 सेकंड दूर कर दिया है, जो वैश्विक विनाश के सबसे करीब होने का संकेत है। परमाणु शक्ति संपन्न देशों का आक्रामक रवैया, कमजोर होते हथियार नियंत्रण समझौते, यूक्रेन और मध्य पूर्व के युद्ध, AI के खतरे और जलवायु परिवर्तन इसके मुख्य कारण हैं। यह घड़ी मानव सभ्यता के आत्म-विनाश के करीब पहुंचने का प्रतीक है।

दुनिया के परमाणु वैज्ञानिकों ने ‘डूम्सडे क्लाक’ यानी प्रलय की घड़ी को अब तक की सबसे खतरनाक स्थिति में पहुंचा दिया है। यह घड़ी अब आधी रात से केवल 85 सेकंड दूर है, जो वैश्विक विनाश के बेहद नजदीक होने का संकेत माना जाता है।

‘बुलेटिन आफ द एटामिक साइंटिस्ट्स’ संस्था ने बताया कि अमेरिका, रूस और चीन जैसे परमाणु शक्ति संपन्न देशों का आक्रामक रवैया, परमाणु हथियार नियंत्रण समझौतों का कमजोर होना, यूक्रेन और मध्य पूर्व के युद्ध, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) के खतरे और जलवायु परिवर्तन इस फैसले की मुख्य वजह हैं।

प्रलय की घड़ी आधी रात से केवल 85 सेकंड दूर
संस्था ने कहा कि बिना नियंत्रण के सैन्य सिस्टम में AI के इस्तेमाल से खतरे बढ़ रहे हैं। AI का दुरुपयोग जैविक हथियार बनाने और झूठी सूचनाएं फैलाने में भी हो सकता है।

साथ ही जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याएं लगातार गंभीर होती जा रही हैं। संस्था की अध्यक्ष एलेक्जेंड्रा बेल ने कहा कि यह स्थिति दुनिया भर में नेतृत्व की विफलता को दिखाती है। उन्होंने चेतावनी दी कि बढ़ती राष्ट्रवादी सोच और ताकत दिखाने की राजनीति मानवता को और बड़े संकट की ओर ले जा रही है।

क्या है डूम्सडे क्लाक, ये दुनिया के लिए चेतावनी क्यों?
डूम्सडे क्लाक कोई असली घड़ी नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। इसे यह बताने के लिए बनाया गया है कि इंसान खुद अपने हाथों से दुनिया को खत्म करने के कितने करीब पहुंच गया है। इसमें आधी रात का मतलब है- वैश्विक तबाही, जैसे परमाणु युद्ध या ऐसी आपदा जिससे मानव सभ्यता बच न सके।

इस घड़ी को 1947 में ‘बुलेटिन आफ द एटामिक साइंटिस्ट्स’ नाम की संस्था ने शुरू किया था, जिसका गठन अल्बर्ट आइंस्टीन और जे राबर्ट ओपनहाइमर ने किया था। डूम्सडे क्लाक को हर साल वैज्ञानिकों और सुरक्षा विशेषज्ञों की एक टीम तय करती है।

वे यह देखते हैं कि दुनिया में हालात कैसे हैं। अगर हालात बिगड़ते हैं तो घड़ी आधी रात के करीब लाई जाती है। अगर दुनिया सुरक्षित दिशा में जाती है तो घड़ी पीछे भी की जा सकती है। उदाहरण के लिए, शीत युद्ध के बाद एक समय यह घड़ी 17 मिनट दूर तक चली गई थी, जो सबसे सुरक्षित दौर माना गया।

Related Articles

Back to top button
T20: भारत का क्लीन स्वीप जानिये कितने खतरनाक हैं कबूतर। शतपावली: स्वस्थ रहने का एक आसान उपाय भारतीय मौसम की ALERT कलर कोडिंग In Uttar Pradesh Call in Emergency