महीनों की ‘साधना’ से तैयार होती है एक हिमाचली शॉल, 800 से 2 लाख रुपये तक पहुंच जाती है कीमत

जब पहाड़ों पर बर्फ गिरती है और ठंडी हवाएं रूह तक कंपा देती हैं, तब हिमाचल की महिलाएं हथकरघों पर गर्माहट बुनती हैं। कुल्लू, किन्नौर, मंडी और लाहुल-स्पीति जैसे शहरों में बर्फबारी के दौरान जब लोग घरों में कैद हो जाते हैं, तब भी हुनरमंद हाथ नहीं रुकते। अपने घरों में महिलाएं हथकरघा से शॉल तैयार करती हैं। शुद्ध ऊन के धागों में पिरोई उनकी मेहनत आज हिमाचली शॉल के रूप में दुनियाभर में पहचान बना चुकी है। ये शाल केवल सर्दी से बचाव का साधन नहीं है, बल्कि पहाड़ की संस्कृति, परंपरा और महिलाओं की आत्मनिर्भरता की मिसाल बन गए हैं।
हिमाचली ऊन क्यों है खास?
हिमाचल प्रदेश की भेड़ों से प्राप्त ऊन को सबसे मुलायम और गर्म ऊन माना जाता है। ठंडी जलवायु और प्राकृतिक चारागाह ऊन की गुणवत्ता को और निखारते हैं। कुल्लू, किन्नौर, मंडी और लाहुल-स्पीति जैसे क्षेत्रों की ऊन में प्राकृतिक चमक और मजबूती होती है, जिससे बनी शॉल हल्की होते हुए भी बेहद गर्म रहती हैं और सालों तक टिकाऊ होती हैं।
डिजाइन में छिपी पहचान
हिमाचली शॉल की खूबसूरती उनके पारंपरिक डिजाइन और रंग-बिरंगी पट्टियों में छिपी है। कुल्लू की खासियत हैं चटख रंग, ज्यामितीय व फूल पत्ती की डिजाइन, तो वहीं किन्नौर का महीन बार्डर और लाहुल-स्पीति की सादगी इन्हें खास बनाती है। पीढ़ियों से चले आ रहे ये डिजाइन्स आज भी कारीगरों की अंगुलियों से जीवित हैं।
प्राकृतिक रंगों की खुशबू
इन शॉल में उपयोग होने वाले रंग भी प्रकृति की देन हैं। अखरोट, केसर, देवदार के पेड़ों की छाल और विभिन्न जड़ी-बूटियों से तैयार खूबसूरत रंग न केवल आंखों को सुकून देते हैं, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी होते हैं। यही कारण है कि विदेशी बाजार में हिमाचली शॉल की मांग बढ़ रही है।
एक शॉल, महीनों की साधना
एक हिमाचली शॉल बनने में सात से आठ महीने लग जाते हैं। ऊन कतरने से लेकर धागा कातने, रंगाई और हथकरघे पर बुनाई तक, हर चरण में कारीगरों की मेहनत और धैर्य झलकता है। यही कारण है कि बाजार में इन शॉल की कीमत 800 रुपये से लेकर दो लाख रुपये तक पहुंच जाती है।
महिलाओं की बदली जिंदगी
हिमाचल प्रदेश में स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हजारों महिलाएं हथकरघा उद्योग के जरिये आजीविका चला रही हैं। एमएसएमई से जुड़ने के बाद उन्हें प्रशिक्षण, विपणन और राष्ट्रीय- अंतरराष्ट्रीय मंच मिला है। वर्ष 2004 में कुल्लू शॉल को मिला जीआई टैग इस उद्योग के लिए संजीवनी साबित हुआ, जिससे असली हिमाचली शॉल को वैश्विक पहचान मिली।
देश-विदेश में बढ़ता दायरा
आज हिमाचली शॉल की मांग यूरोप, अमेरिका और खाड़ी देशों तक पहुंच चुकी हैं। अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनियों और फैशन इवेंट्स में इनकी मौजूदगी हिमाचल को विश्व फैशन मानचित्र पर दर्ज करा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से प्रशंसित और राष्ट्रपति द्वारा नारीशक्ति पुरस्कार से सम्मानित मंडी की उद्यमी अंशुल मल्होत्रा टेक्सटाइल मंत्रालय की प्रशिक्षक के रूप में ग्रामीण महिलाओं को हस्तशिल्प सिखा रही है। उनका कहना है कि बारीक कारीगरी वाले शॉल को तैयार करने में एक वर्ष तक का समय लगता है। कारीगर की मेहनत अधिक होने से ऐसे शॉल के दाम भी अधिक होते हैं। हिमाचली ऊन से चुनी शाल आज सिर्फ शरीर नहीं दकतीं, बल्कि आत्मनिर्भरता, सम्मान और प्रेरणा की गर्माहट भी दे रही है।



