बच्चों और बड़ों के लिए पूरी तरह सुरक्षित है टीबी की नई वैक्सीन

भारत में टीबी जैसी गंभीर बीमारी को हराने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में दो नई टीबी वैक्सीन- वीपीएम 1002 (VPM1002) और इम्यूवैक (IMMUVAC) का एक बड़ा परीक्षण किया गया है।

‘द ब्रिटिश मेडिकल जर्नल’ में प्रकाशित इस फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल के नतीजे बताते हैं कि ये दोनों वैक्सीन बच्चों और वयस्कों के लिए सुरक्षित तो हैं, लेकिन ये टीबी के हर रूप से पूरी तरह सुरक्षा प्रदान नहीं कर सकतीं।

क्या है ‘प्रीवेनटीबी’ परीक्षण?
यह परीक्षण दिल्ली स्थित भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के शोधकर्ताओं द्वारा टीबी के मामलों को कम करने के उद्देश्य से किया गया है।

जुलाई 2019 से दिसंबर 2020 के बीच दिल्ली, महाराष्ट्र और तमिलनाडु सहित 6 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 18 अलग-अलग स्थानों पर यह ट्रायल हुआ।
इस ट्रायल में टीबी रोगियों के घरों में रहने वाले 12,700 से अधिक ऐसे लोगों को शामिल किया गया जिनकी उम्र 6 वर्ष या उससे अधिक थी।
लोगों को रैंडम तरीके से वीपीएम 1002, इम्यूवैक या एक प्लेसबो (हर समूह में 4,239 लोग) की खुराक दी गई। एक महीने बाद 11,829 लोगों को दूसरी खुराक दी गई और लगभग 38 महीनों तक इनकी निगरानी की गई। कुल 96.7 प्रतिशत (12,295) लोगों ने परीक्षण पूरा किया।

नई वैक्सीन की जरूरत क्यों पड़ी?
वर्तमान में भारत में नवजात शिशुओं को जन्म के समय टीबी से बचाने के लिए बीसीजी (BCG) का टीका लगाया जाता है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह टीका छोटे बच्चों को गंभीर प्रकार की टीबी से तो बचाता है, लेकिन यह किशोरों और वयस्कों के लिए ज्यादा प्रभावी नहीं है। इसी कमी को दूर करने के लिए नई वैक्सीन जांची जा रही हैं।

नई वैक्सीन के बारे में खास बातें
वीपीएम 1002 (VPM1002): यह आनुवंशिक इंजीनियरिंग (जेनेटिक इंजीनियरिंग) का उपयोग करके बनाई गई एक पुनःसंयोजित वैक्सीन है। इसे जर्मनी की फार्मास्यूटिकल कंपनी ‘सेरम लाइफ साइंस यूरोप जीएमबीएच’ द्वारा विकसित किया गया है।
इम्यूवैक (IMMUVAC): यह एक निष्क्रिय वैक्सीन है जिसे बीमारी फैलाने वाले रोगजनक के गैर-संक्रामक रूप से बनाया गया है। इसे ICMR और अहमदाबाद की ‘कैडिला फार्मास्यूटिकल्स’ ने मिलकर तैयार किया है।

क्या रहे ट्रायल के अंतिम नतीजे?
यह फेज-3 ट्रायल किसी भी नए इलाज की सुरक्षा और प्रभावशीलता को मापने का अंतिम चरण होता है। इसके नतीजे मिले-जुले रहे हैं:

सुरक्षा और प्रतिरक्षा: दोनों ही वैक्सीन वयस्कों और बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित पाई गईं और इन्होंने शरीर में एक अच्छी इम्यून प्रतिक्रिया भी पैदा की।
कहां मिली निराशा: परीक्षण में पाया गया कि ये दोनों वैक्सीन फेफड़ों की टीबी या टीबी के सूक्ष्मजीवों द्वारा होने वाले सभी प्रकार के संक्रमण को पूरी तरह रोकने में सफल नहीं हो पाईं।

कहां मिली बड़ी सफलता?
फेफड़ों के बाहर शरीर के अन्य अंगों में होने वाली टीबी को ‘एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी’ कहते हैं, जिसमें मृत्यु का खतरा फेफड़ों की टीबी से भी ज्यादा होता है।

इस वैक्सीन ने 36 से 60 वर्ष तक के वयस्कों सहित सभी आयु वर्गों में एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी के खिलाफ 50.4 प्रतिशत असर दिखाया। इसके अलावा, 6 से 14 साल के बच्चों में इसने हर तरह की टीबी (फेफड़ों की और एक्स्ट्रापल्मोनरी) से बचाव किया।
इस वैक्सीन ने केवल 6 से 10 साल के बच्चों में एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी के खिलाफ सुरक्षा प्रदान की।

भले ही ये नई वैक्सीन टीबी के हर रूप को रोकने में 100% कारगर न हों, लेकिन ‘वीपीएम 1002’ द्वारा एक्स्ट्रापल्मोनरी टीबी (उच्च मृत्यु दर वाली टीबी) के खिलाफ दिखाया गया 50.4% का बचाव सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बहुत ही महत्वपूर्ण और संभावित लाभकारी कदम माना जा रहा है।

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