बंगाल की 500 साल पुरानी धरोहर है ‘शांतिपुरी साड़ी’, कैसे बनी नवाबों की शान से आम महिलाओं की पहचान

पश्चिम बंगाल के नादिया जिले का शांतिपुर अपनी 500 साल पुरानी ‘शांतिपुरी साड़ियों’ के लिए प्रसिद्ध है। ये साड़ियां अपनी बारीक बुनाई, शुद्ध सूती कपड़े और जामदानी व डोबी तकनीकों के लिए जानी जाती हैं। मुगल काल से राजघरानों की पसंद रही ये साड़ियां गर्मी के लिए आरामदायक होती हैं और इनमें प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता है।
भारत के पारंपरिक परिधानों की बात हो और बंगाल की बुनाई का जिक्र न आए, ऐसा मुमकिन नहीं है। पश्चिम बंगाल के नादिया जिले का एक छोटा-सा शहर शांतिपुर, आज देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित हथकरघा केंद्रों में से एक माना जाता है।
यहां की ‘शांतिपुरी साड़ियां’ अपनी बारीक बुनाई और बेमिसाल शुद्ध सूती कपड़े के लिए दुनिया भर में मशहूर हैं। यह सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि बंगाल की सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर है। आइए जानें इसके बारे में।
नवाबों की पसंद से बना आम महिलाओं का श्रृंगार
शांतिपुरी साड़ियों का इतिहास लगभग 500 वर्षों से भी ज्यादा पुराना है। मुगल काल के दौरान शांतिपुर अपनी बेहतरीन बुनाई के लिए जाना जाता था। उस समय यहां की बुनी हुई साड़ियां इतनी भव्य होती थीं कि उन्हें खास तौर पर राजघरानों और नवाबों के लिए भेजा जाता था।
18वीं और 19वीं शताब्दी में जब ब्रिटिश शासन का दौर आया, तब भी इस कला ने अपनी पहचान को फीका नहीं पड़ने दिया। पीढ़ी-दर-पीढ़ी बुनकर परिवारों ने इस कला को सहेज कर रखा और आज भी इसे मुख्य रूप से हथकरघा पर ही बुना जाता है।
जामदानी तकनीक और बारीक बुनाई का जादू
शांतिपुरी साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत इनके निर्माण की प्रक्रिया है। इन साड़ियों को बनाने में खासतौर से जामदानी और डोबी तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। इसके निर्माण में इस्तेमाल होने वाला बारीक सूती कपड़ा इतना आरामदायक होता है कि इसे गर्मी के मौसम के लिए सबसे बेहतर माना जाता है।
इन साड़ियों की रंगाई में अक्सर प्राकृतिक और सोबर रंगों का इस्तेमाल किया जाता है, जो इन्हें एक सॉफिस्टिकेटेड और सुंदर लुक देते हैं। कारीगर इनके बॉर्डर और पल्लू पर हाथ से बारीकी से मंदिर, फूल-पत्तियों और ज्यामितीय आकृतियों की कलाकारी उकेरते हैं।
हर पसंद के लिए खास वैरायटी
शांतिपुर की साड़ियों में डिजाइन के आधार पर कई किस्में उपलब्ध हैं, जो हर उम्र की महिलाओं के बीच लोकप्रिय हैं। इनमें से प्रमुख हैं-
निलांबरी- गहरे नीले रंग की पारंपरिक साड़ी।
अनारी- अपनी खास रंगत के लिए मशहूर।
फुलवारी- फूलों के खूबसूरत डिजाइनों से सजी हुई।
चौको पार- चौकोर बॉर्डर वाली खास साड़ी।
विरासत और कला का संगम
आज के आधुनिक दौर में भी शांतिपुर की साड़ियां अपनी जड़ों से जुड़ी हुई हैं। यह कला न केवल बंगाल के बुनकरों को रोजगार देती है, बल्कि भारत की प्राचीन हस्तशिल्प कला का गौरव भी बढ़ाती है। अगर आप सादगी और भव्यता का मिश्रण ढूंढ रहे हैं, तो शांतिपुरी साड़ी से बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता।



