धातु से बने धागे: जानिए कैसे 18वीं शताब्दी से आज तक बदली गोटा कढ़ाई की तकनीक

18वीं शताब्दी में राजसी वस्त्रों में सजावट के लिए प्रयोग होने वाली कला ‘गोटा’ मानी जाती है शुभ और समृद्धि का प्रतीक। यह परिधान ही नहीं, कई किस्म की रचनात्मक सजावट के लिए भी पसंद की जाती रही है, जानिए मैप अकादमी के इस आलेख से।

गोटा कपड़ों और अन्य वस्तुओं को सजाने की एक कला है। यह राजस्थान, गुजरात, पंजाब एवं हिमाचल प्रदेश में बहुत लोकप्रिय है। गोटा एक सजावटी पट्टी या फीता है, जिसे सपाट सुनहरे या चांदी के तारों एवं रेशमी/सूती धागों से बुना जाता है। पारंपरिक रूप से हाथ से कपड़ों पर टांका जाने वाला गोटा शुभता एवं समृद्धि का प्रतीक है।

इसे कपड़े के बार्डर और अलंकरण के रूप में, एप्लीक और एंब्रायडरी के जरिए लगाया जाता है। आमतौर पर गोटा के उपयोग को राजपूत कुलीन वर्ग से जोड़ा जाता है। मूलतः इसका प्रयोग 18वीं शताब्दी से शाही वस्त्रों तथा मंदिर की मूर्तियों हेतु ओढ़नियों में होने लगा था। वर्तमान में गोटा कढ़ाई के लिए ल्यूरैक्स नाम का कृत्रिम फाइबर उपयोग किया जाता है।

सोने-चांदी में लिपटी परंपरा
गोटा कढ़ाई दक्षिण एशिया की अनेक वस्त्र परंपराओं में से एक है, जिसमें सोना एवं चांदी के उपयोग से लोग उच्च सामाजिक पद, प्रतिष्ठा एवं सौभाग्य को दर्शाते हैं। इसमें सोने और चांदी के विशेष चपटे रेशों का उपयोग होता है, जिन्हें ‘बदला’ कहते हैं। यही रेशा ‘जरी’ (सुनहरा या चांदी का धागा) बनाने में भी काम आता है, जिसका प्रयोग बुनाई और बारीक कढ़ाई (जरदोजी और अरी) के लिए किया जाता है।

माना जाता है कि इसकी शुरुआत 14वीं शताब्दी में दिल्ली सल्तनत और मुगल दरबारों के दौरान फारसी परंपरा से प्रभावित कारखानों में हुई। 17वीं शताब्दी में मुगलों के पतन के बाद, ये कुशल कारीगर दिल्ली से निकलकर देश के विभिन्न प्रांतीय दरबारों में फैल गए।

मिली भव्य वस्त्र-सज्जा शैली
उत्तर भारत में जयपुर, जो कि 19वीं शताब्दी तक राजपूत सत्ता का महत्त्वपूर्ण केंद्र था, जरी और बदला के निर्माण का प्रमुख केंद्र बन गया। लखनऊ एवं सूरत भी इसके निर्माण के मुख्य स्थान बने। जयपुर, विशेषकर गोटा बुनाई के लिए मशहूर हुआ। हिमाचल प्रदेश और जयपुर के राजपूत दरबारों के साथ-साथ पंजाब के सिख दरबारों ने गोटा कढ़ाई को अपने वस्त्रों, सिरपोशों, जूतियों और वैवाहिक वस्त्रों (ब्राइडल ट्रूसो) का हिस्सा बनाया।

यहां गोटा कढ़ाई की लोकप्रियता संभवतः इस वजह से भी थी कि इन क्षेत्रों में स्थानीय रेशम बुनाई की परंपराएं नहीं थीं और न ही जरदोजी व अरी कढ़ाई जैसी कलाओं को जरूरी संरक्षण और संसाधन मिलते थे। ऐसे में शासक वर्ग एक विशिष्ट, लेकिन भव्य वस्त्र-सज्जा शैली की तलाश में थे, जो उन्हें गोटा कढ़ाई में प्राप्त हुई।

पीढ़ी दर पीढ़ी चली धातु की धरोहर
गोटा कढ़ाई ने सुलभता और सुंदरता के कारण भारी धातु कार्यों का स्थान ले लिया और उत्तर भारत की वस्त्र परंपरा का अनिवार्य हिस्सा बन गई। उदयपुर में पहले ‘डांका’ (सोने-चांदी के पत्तरों का काम) प्रचलित था, लेकिन यह भारी और महंगा था। इसके विपरीत गोटा हल्का, सस्ता और लचीला होने के कारण अधिक लोकप्रिय हुआ, जिससे कपड़ों पर भारी सजावट करना आसान हो गया।

गोटा कढ़ाई राजपूत महिलाओं के पारंपरिक और समारोहिक वस्त्रों की विशिष्ट पहचान बन गई। यह कला राजस्थान के राजदरबारों के अलावा लखनऊ, मिर्जापुर, वाराणसी और औरंगाबाद जैसे शहरों में भी फैल गई। दिलचस्प पहलू यह था कि पुराने जरी वाले कपड़ों से कीमती धातु निकाली जाती थी और उसे नए वस्त्रों में पुनः उपयोग किया जाता था। इस तरह धातु पीढ़ियों तक चलती रहती थी।

बुनाई के तीन रूप
गोटा पारंपरिक रूप से हथकरघे पर तैयार किया जाता है, जिसमें ‘बदला’ (धात्विक धागा) और सूती या रेशमी धागों का उपयोग ताने-बाने के रूप में होता है। इसमें साटन, टवील और सीधी बुनाई का प्रयोग किया जाता है। गोटा कढ़ाई के अलंकरण (जैसे बेल, जाली और बूटा) मुख्य रूप से मुगल कला और इंडो-अरेबिक वास्तुकला से प्रेरित हैं। अपनी धात्विक प्रकृति के कारण यह बुना हुआ कपड़ा उभारदार डिजाइनों में भी ढाला जा सकता है।

सामान्य बुनाई में तैयार की गई पतली गोटा पट्टियों को ‘मसिया’ कहा जाता है। यह समृद्धि और उर्वरता का प्रतीक मानी जाती हैं। टवील बुनाई में तैयार की गई चौड़ी गोटा पट्टियां ‘लप्पा’ कहलाती हैं। इन्हें परंपरागत रूप से राजपूत स्त्रियों के पोशाक में घाघरे की किनारी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। गोटा की अलग-अलग आकृतियों- जैसे ज्यामितीय या पुष्प रूपों में पत्ती, फूल या टुकड़ी- को भी कपड़े पर टांका जाता है और कभी-कभी कढ़ाई के साथ जोड़ा जाता है।

शाही विरासत से आधुनिक बदलाव तक
स्वतंत्रता के बाद रियासतों के पतन के कारण यह कला सीमित हो गई, लेकिन सरकारी प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने इसे महिलाओं के लिए घर बैठे रोजगार का जरिया बना दिया। ल्यूरैक्स जैसे कृत्रिम धागों से गोटा सस्ता और सुलभ हो गया। इसने पारंपरिक धातु के गोटे की जगह ले ली, जिससे यह कला ग्रामीण क्षेत्रों तक भी पहुंच गई।

आधुनिक गोटा सस्ता और चमकदार है, मगर इसमें पारंपरिक गोटे जैसी गहराई और उभार की कमी है। हालांकि, तांबे और ल्यूरैक्स वाले गोटे को आज भी शुभ कार्यों और उत्सवों का प्रतीक माना जाता है। सोने-चांदी से बनी पारंपरिक गोटा कढ़ाई तो अब पारिवारिक इतिहास की दुर्लभ धरोहर है!

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