भाद्रपद अमावस्या पर सूर्य-चंद्रमा के दुर्लभ मिलन से भाग्य के खुलेंगे द्वार

भाद्रपद अमावस्या का दिन पितरों की कृपा प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। इस दिन शुभ और मांगलिक कार्यों को करने की मनाही होती है। भाद्रपद अमावस्या को पिठौरी अमावस्या के रूप में भी जाना जाता है। इस बार भाद्रपद अमावस्या 10 सितंबर को मनाई जाएगी।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पितरों का तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा से जीवन में सफलता प्राप्त होती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, भाद्रपद अमावस्या पर सूर्य और चंद्रमा का मिलन होता है, जिसका प्रभाव सभी राशियों पर पड़ता है। ऐसे में आइए इस आर्टिकल में एस्ट्रोपत्री के श्री चंद्रेश शर्मा जी के अनुसार जानते हैं कि भाद्रपद अमावस्या पर किन ग्रहों की स्थिति आपका भाग्य बदल सकती है।

श्री चंद्रेश शर्मा जी बताते हैं कि भाद्रपद माह की अमावस्या धार्मिक और ज्योतिषीय दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली मानी जाती है।

ग्रहों की स्थिति और धार्मिक प्रभाव
सूर्य और चंद्रमा का मिलन: इस तिथि पर सूर्य और चंद्रमा का एक ही राशि में मिलन होता है, जो पितृ दोष निवारण और मानसिक शुद्धि का विशेष योग बनाता है। ग्रहों का यह गोचर जीवन में बड़े सकारात्मक बदलाव लाने की क्षमता रखता है।
स्नान, दान और तर्पण का महत्व: इस दिन पवित्र नदियों में स्नान, दान और पितरों का तर्पण करने से जन्मपत्रिका के अनिष्टकारी ग्रह शांत होते हैं।

ग्रह दोषों से मुक्ति: यदि इस समय राहु-केतु या शनि की प्रतिकूल दशा चल रही हो, तो अमावस्या पर किए गए धार्मिक उपाय और तर्पण से भाग्य के बंद द्वार खुलते हैं, मानसिक क्लेश दूर होता है और जीवन में रोजगार तथा धन वृद्धि के नए मार्ग प्रशस्त होते हैं।

जरूर करें ये उपाय
पितृ दोष से मुक्ति पाने के लिए अमावस्या के दिन पूजा-अर्चना करने के बाद मंदिर में या जरूरतमंदों को पितरों का ध्यान करते हुए अन्न, वस्त्र, जूते-चप्पल और छाते का दान करें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस उपाय को करने से पितृ दोष की समस्या दूर होती है और सुख-समृद्धि में वृद्धि होती है।
इसके अलावा रोजाना पहली रोटी गाय के लिए और आखिरी रोटी कुत्ते के लिए निकालें। ऐसा माना जाता है कि इस उपाय को नियमित रूप से करने से जीवन में किसी चीज की कमी नहीं होती है।
पितरों के तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध के दौरान पितृ मंत्रों और पितृ चालीसा का पाठ करें। इससे पूर्वज प्रसन्न होते हैं और परिवार के सदस्यों पर अपनी कृपा बरसाते हैं।

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